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क्लास 4 – तर्क से तार्किक, धर्म से धार्मिक तो अध्यात्म से…?

गाँधीजी को अधिकतर लोग धार्मिक मानते हैं लेकिन उनकी दिलचस्पी धर्म से अधिक अध्यात्म में थी। हम कह सकते हैं कि वे धार्मिक नहीं, आध्यात्मिक थे, और कई मामलों में तार्किक भी। जी नहीं, मैं आज गाँधीजी के विचारों पर कोई क्लास नहीं ले रहा। मैं केवल बता रहा हूँ कि जब तर्क, धर्म और अध्यात्म जैसे शब्दों के बाद ‘इक’ लगता है तो कैसे शब्द के आरंभ का ‘अ’ स्वर ‘आ’ में बदल जाता है। लेकिन कभी-कभी ऐसा नहीं भी होता। कब होता है, कब नहीं होता, जानने के लिए आगे पढ़ें।

र्क और तार्किक, र्म और धार्मिक – इन दोनों शब्दों में कोई नियम नज़र आ रहा है आपको? नहीं? मैं बताता हूँ। तर्क और धर्म, ये दोनों शब्द ‘अकार’ से शुरू होते हैं लेकिन जब इनसे विशेषण बनाने के लिए ‘इक‘ लगाया जाता है तो ‘अ’ का ‘आ’ हो जाता है। बाक़ी स्वरों से शुरू होनेवाले शब्दों में भी ऐसा ही बदलाव आता है लेकिन वहाँ परिवर्तित अक्षर ‘आ’ नहीं, कुछ और होता है। इसके बारे में नीचे जानते हैं।

धर्म और तर्क – ये दोनों शब्द अर्थ में भले ही परस्परविरोधी हों लेकिन जब इनके पीछे -इक प्रत्यय लगाकर विशेषण बनाने का मामला होता है तो ये दोनों एक ही नियम पर अमल करते हैं। नियम यह कि जो शब्द अ से शुरू होते हैं, उनके पीछे -इक प्रत्यय लगाकर विशेषण बनाने पर इनका आरंभिक ‘अ’ ‘आ’ में बदल जाता है। इसी कारण धर्म से धार्मिक और तर्क से तार्किक होता है। परंतु क्या इसी आधार पर अध्यात्म से आध्यात्मिक होगा? इसके बारे में आगे बात करेंगे। पहले कुछ और उदाहरण देख लेते हैं जहाँ यह नियम अमल में आ रहा है।

आइए, नीचे ऐसे ही कुछ और उदाहरण देखते हैं।

  • संसार से सांसारिक
  • र्थ से र्थिक
  • रिवार से पारिवारिक
  • र्म से कार्मिक
  • र्शन से दार्शनिक
  • प्रदेश से प्रादेशिक
  • त्काल से तात्कालिक
  • हृद से हार्दिक

ये वे शब्द हैं जिनके शुरू में अ है या व्यंजन के साथ अ स्वर है जैसे क, द, प्र, त आदि। अब सवाल यह उठ सकता है कि अ से आ का नियम तो हमने समझ लिया मगर आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ और औ से (या व्यंजनों के मामले में इन स्वरों से) शुरू होनेवाले शब्दों के बारे में क्या नियम है। क्या वहाँ भी ‘आ’ ही होगा? नहीं, वहाँ आ नहीं, कुछ और होगा और मैं सारी मात्राओं के नियम नीचे बता रहा हूँ हालाँकि मैं जानता हूँ कि नियम जाने बिना भी ज़्यादातर शब्दों को सही-सही ही बोलते आए होंगे।

  1. अ से शुरू होनेवाले शब्दों का पहला अक्षर आ हो जाएगा और आ से शुरू होनेवाले शब्दों में आ का आ ही रहेगा।
  2. इ, ई और ए से शुरू होनेवाले शब्दों में पहला अक्षर ऐ हो जाएगा। ऐ से शुरू होनेवाले शब्दों में ऐ का ऐ ही रहेगा।
  3. उ, ऊ और ओ से शुरू होनेवाले शब्दों में पहला अक्षर औ हो जाएगा। औ से शुरू होनेवाले शब्दों में औ का औ ही रहेगा।

आइए, नीचे इन सभी के उदाहरण देखते हैं।

अ से शुरू होने वाले शब्द
समय से सामयिक
सप्ताह से साप्ताहिक
वर्ष से वार्षिक

आ से शुरू होने वाले शब्द
मास से मासिक
वास्तव से वास्तविक

इ, ई और ए से शुरू होने वाले शब्द
दिन से दैनिक
इच्छा से ऐच्छिक
जीव से जैविक
देह से दैहिक
वेद से वैदिक

ऐ से शुरू होने वाले शब्द
भैषज से भैषजिक
वैष्णव से वैष्णविक

उ, ऊ और ओ से शुरू होने वाले शब्द
उद्योग से औद्योगिक
पुराण से पौराणिक
भूगोल से भौगोलिक
भूत से भौतिक
लोक से लौकिक
योग से यौगिक

औ से शुरू होने वाले शब्द
औषधि से औषधिक
लौह से लौहिक

ऊपर आपने वे शब्द देखे जो रूढ़ शब्द हैं यानी वे अपने-आपमें स्वतंत्र शब्द हैं लेकिन कुछ शब्द होते हैं जो दो शब्दों या पदों को मिलाकर बनते हैं जैसे राजनीति जो राज और नीति को मिलाने से बना है। इसी तरह संविधान जो सम् और विधान के मिलने से बना है। ऐसे शब्दों में समस्या आती है कि परिवर्तन पहले पद में करें या दूसरे पद में। इसके बारे में कोई नियम नहीं है और जो शब्द ज़्यादा चल गए हैं, वही मान्य हो गए हैं। नीचे हम ऐसे ही कुछ शब्द देखते हैं।

  • संविधान से सांविधानिक (अ का आ हो गया) भी सही है और संवैधानिक (इ का ऐ हो गया) भी।
  • राजनीति से राजनीतिक (आ का आ ही रहा) भी सही है और राजनैतिक (ई का ऐ हो गया) भी।
  • प्रशासन से प्रशासनिक में प्र उपसर्ग है और उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है यानी वह प्रा नहीं हो रहा है। उधर शासन में चूँकि शुरू में आ की मात्रा है, इसलिए उसमें कोई बदलाव नहीं होगा।

कुछ ऐसे भी शब्द हैं जिनमें दोनों पदों में परिवर्तन देखा जाता है जैसे सार्वभौमिक (सर्वभूमि संबंधी), पारलौकिक (परलोक संबंधी) आदि। ऐसे शब्द बहुत कम हैं।

अब मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ – यदि सप्ताह से साप्ताहिक तो हफ़्ता से क्या हाफ़्तिक होगा? या शरीर से शारीरिक तो क्या बदन से बादनिक होगा? क्या कभी आपने हाफ़्तिक या बादनिक शब्द सुने हैं? नहीं सुने होंगे और कारण यह कि सप्ताह और शरीर जहाँ संस्कृत के शब्द हैं, वहीं हफ़्ता और बदन उर्दू के। कहने का अर्थ यह कि -इक का यह नियम केवल संस्कृत के शब्दों में चलता है, उर्दू या अंग्रेज़ी से हिंदी में शामिल हुए शब्दों में नहीं।

अरे हाँ, कुछेक शब्द हैं जो हमारे ऊपर बताए नियम के अपवाद हैं जैसे स्वर्गिक, चमत्कारिक, पत्रकारिक, क्रमिक, क्षणिक, वणिक आदि। कुछ ऐसे भी हैं जिनके दोनों रूप चल रहे हैं – जैसे व्यवहारिक/व्यावहारिक, अध्यात्मिक/आध्यात्मिक। शब्दकोश इन दोनों रूपों को सही बताते हैं। नीचे आप्टे के संस्कृत शब्दकोश की प्रविष्टियाँ देख सकते हैं।

हमने ऊपर जो शब्द देखे, उनमें -इक हमने इसलिए लगाया ताकि संज्ञा से विशेषण बनाया जाए। जैसे वर्ष, मास और सप्ताह संज्ञाएँ हैं जिनका अर्थ है साल, महीना या हफ़्ता लेकिन जब हम वार्षिक, मासिक या साप्ताहिक परीक्षा कहते हैं तो हम उस परीक्षा के बारे में बताते हैं जो वर्ष, महीने या सप्ताह में एक बार होती है। वार्षिक, मासिक या साप्ताहिक शब्द परीक्षा की विशेषता बताते हैं कि यह कैसी परीक्षा है, इसीलिए इन्हें हम विशेषण कहते हैं।

ऐसा ही एक नियम भाववाचक संज्ञा के बारे में भी है। भाववाचक संज्ञा कई तरह से बनती है : -त्व लगाकर (बंधुत्व) , -ता लगाकर (सुंदरता), -ई लगाकर (चिकनाई), -पन लगाकर (बड़प्पन), -य लगाकर (सौंदर्य) आदि-आदि। यहाँ हम उन शब्दों की बात करेंगे जहाँ शब्द के अंत में -य लगाकर भाववाचक संज्ञा बनाई जाती है और आप देखेंगे कि वहाँ भी वही नियम काम कर रहे हैं जो हमने ऊपर पढ़े।

जैसे एक शब्द लेते हैं सुंदर। सुंदर शब्द किसी की ख़ूबसूरती बताता है। यह विशेषण है। इससे शब्द बना सुंदरता या सौंदर्य। जब -ता लगाते हैं तब तो शब्द के शेष स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता लेकिन जब -य लगाते हैं तो ‘सु’ का ‘सौ’ हो जाता है और आख़िर का अक्षर आधा हो जाता है यानी उसका स्वर हट जाता है। यानी वही नियम जो हमने ऊपर देखा – उ का औ (पुराण से पौराणिक और उद्योग का औद्योगिक)। नीचे ऐसे ही कुछ शब्द देखिए जहाँ भाववाचक संज्ञा बनाने पर पहला अक्षर ऊपर बताए गए ढर्रे के मुताबिक़ ही बदल गया है।

  • समर्थ से सामर्थ्य (अ का आ)
  • प्राची से प्राच्य (आ का आ)
  • विधवा से वैधव्य (इ का ऐ)
  • ईश्वर से ऐश्वर्य (ई का ऐ)
  • कुमार से कौमार्य (उ का औ)
  • शूर से शौर्य (ऊ का औ)
  • एक से ऐक्य (ए का ऐ)

आपमें से कुछ पाठकों के दिमाग़ में यह सवाल आ सकता है कि जब शब्द के अंत में -य लगाने पर उ का औ होना चाहिए तो पूजा से पूज्य और स्तुति से स्तुत्य क्यों होता है, पौज्य और स्तौत्य क्यों नहीं। तो मैं उन पाठकों का ध्यान इस बात पर दिलाऊँगा कि ऊपर के सारे शब्द भाववाचक संज्ञाएँ हैं, जबकि पूज्य (पूजा करने योग्य) और स्तुत्य (प्रशंसा करने योग्य) विशेषण हैं।

आपने ऊपर समर्थ से सामर्थ्य का उदाहरण देखा। ज़रा सोचकर बताइए कि सामर्थ्य स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग? सच यह है कि यह शब्द दोनों ही रूपों में इस्तेमाल होता है लेकिन सही क्या है, यह जानने के लिए शब्द पहेली सीरीज़ की यह 20वीं क्लास पढ़ें।

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