क्या कभी आपने सोचा है कि जब पाँचवाँ, सातवाँ, आठवाँ आदि के अंत में ‘वाँ’ है तो चार और छह से बनने वाले क्रमसूचक शब्दों में ‘वाँ’ क्यों नहीं है? चौथा को हम चारवाँ और छठा को छहवाँ या छठवाँ क्यों नहीं बोलते? जानने के लिए आगे पढ़ें।
जब मैंने फ़ेसबुक पर छठा और छठवाँ के बीच पोल किया तो मैं पहले ही मैं जानता था कि अधिकतर लोग इसका सही जवाब देंगे। मुझे तो यह भी शक था कि शायद एक भी व्यक्ति दूसरे विकल्प यानी छठवाँ के पक्ष में वोट न दे लेकिन 24% यानी क़रीब एक-चौथाई लोगों ने उसके पक्ष में वोट डाला। यह मेरे लिए आश्चर्यजनक है कि इतने अधिक लोग छठवाँ को सही मानते हैं।

यह सही है कि तीन-चौथाई लोग सही शब्द जानते हैं लेकिन इसकी भी पूरी संभावना है कि वे यह नहीं जानते कि छठा क्यों सही है। इसीलिए मैंने सोचा कि आज इसपर चर्चा हो जाए।
बचपन से मुझे यह बात परेशान करती थी कि जब पाँच के बाद के सारे अंकों का विशेषण बनाते समय उन संख्याओं के बाद ‘वाँ’ लग जाता है (पाँचवाँ, सातवाँ, ग्यारहवाँ, बीसवाँ, सौवाँ आदि) तो छह का छहवाँ क्यों नहीं होता। साथ ही मुझे यह भी समझ में नहीं आता था कि पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा के बजाय एकवाँ, दोवाँ, तीनवाँ और चारवाँ क्यों नहीं होता।
फिर मैंने अंग्रेज़ी से तुलना की तो वहाँ भी FOURth, SIXth और SEVENth की तरह ONEth, TWOth, THREEth नहीं होता, First, Second, Third होता है। मामले के अंतरराष्ट्रीय फैलाव को देखकर मैंने हथियार डाल दिए और उसपर विचार करना छोड़ दिया।
लेकिन जबसे हिंदी-अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं के शब्दों की गहराई में जाने की रुचि जगी है, तबसे इन संख्याओं पर भी फिर से सोचना शुरू कर दिया है। पहला, दूसरा और तीसरा के बारे में बहुत सोचने-विचारने के बाद भी अब तक कुछ अनुमान नहीं लगा पाया था लेकिन चार के बाद वाले अंकों का पैटर्न समझ में आ गया। आज हम उसी पैटर्न की बात करेंगे और जानेंगे कि पाँचवाँ, सातवाँ, आठवाँ आदि की तरह चारवाँ और छहवाँ क्यों नहीं होता।
यह तो हम जानते ही हैं कि ये सारे अंक संस्कृत से आए हैं। अब हम देखते हैं कि संस्कृत में चार से दस तक की गिनती कैसे लिखी जाती है। मैंने ये संख्याएँ संस्कृत के कोश से देखकर लिखी हैं (मैं ख़ुद संस्कृत में सिफ़र हूँ)। नेट पर कहीं-कहीं मैंने इनके बाद विसर्ग भी लगा हुआ देखा है जैसे चतुर्थः, पंचमः, षष्ठः। मैंने बिना विसर्ग वाले विकल्प ही नीचे सूची में डाले हैं। वैसे चतुर्थ और पंचम लिखें या चतुर्थः और पंचमः, इससे हमारे निष्कर्ष पर कोई अंतर नहीं पड़ने वाला।
नीचे सूची देखें।
- चतुर्थ (चौथा)
- पंचम (पाँचवाँ)
- षष्ठ (छठा)
- सप्तम (सातवाँ)
- अष्टम (आठवाँ)
- नवम (नौवाँ)
- दशम (दसवाँ)
इन संख्याओं में आप देखेंगे कि चतुर्थ और षष्ठ के अलावा बाक़ी सबके अंत में ‘म’ है और हिंदी अंकों के मामले में भी चौथे और छठे के अलावा सभी में ‘वाँ’ है। इससे जो एकमात्र निष्कर्ष निकालता है, वह यह कि जिन संख्याओं के अंत में ‘म’ था, उनमें ‘म’ हिंदी में आकर ‘व’ में बदल गया। साथ ही ‘म’ की नासिक्य (नाक से बोली जाने वाली) ध्वनि का असर ‘व’ पर आ गया और वह अनुनासिक यानी वँ हो गया। बाद में (या साथ में) ‘वँ’ का ‘वाँ’ हो गया।
‘वँ’ का ‘वाँ’ क्यों हुआ, इसके कई कारण हो सकते हैं। एक कारण भाषामित्र Yogendranath Mishra ने बताया है – स्वार्थे क प्रत्यय का – लेकिन यहाँ हम उसपर चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि वह हमें विषय से भटका देगा। बेहतर यही है कि हम अपने मूल मुद्दे पर टिके रहें कि जब पाँचवाँ से दसवाँ तक सबके अंत में ‘वाँ’ है तो चौथा और छठा के अंत में ‘था’ और ‘ठा’ क्यों है।
अगर आप ऊपर के अंकों को फिर से देखेंगे तो कारण समझ जाएँगे। कारण यह कि चतुर्थ और षष्ठ के अंत में ‘म’ नहीं, ‘थ’ और ‘ठ’ हैं। सो ये अंक भी जब (प्राकृत से होते हुए) अपना रूप बदलकर हिंदी में आए तो चतुर्थ (या प्राकृत के चउत्थ) का ‘थ’ था में और षष्ठ का ‘ठ’ ठा में बदल गया। बन गए चौथा और छठा। अगर इन दोनों के अंत में भी ‘म’ होता यानी अगर ये चतुर्थम और षष्ठम होते तो वे भी बदलकर चौथवाँ और छठवाँ हो गए रहते। सिंपल।
लेकिन आपने यह तो नहीं पूछा कि पंचम, सप्तम आदि शब्दों में मौजूद ‘म’ आख़िर ‘वँ’ में क्यों बदला। इसका कारण मुझे भी नहीं मालूम था लेकिन जैसा कि योगेंद्र जी ने बताया, ‘म’ और ‘व’ दोनों ओष्ठ्य ध्वनियाँ हैं यानी होंठों के मिलने से उत्पन्न होती हैं इसलिए उनका एक-दूसरे में परिवर्तन स्वाभाविक है। हिंदी में ऐसे ढेर सारे शब्द हैं जहाँ हम ‘म’ का ‘व’ में बदलना देखते हैं। नीचे एक छोटी-सी झलक देखें।
- ग्राम से गाँव
- कुमार से कुँवर
- भ्रमर से भँवर
- कमल से कँवल
- चामर से चँवर
- श्यामल से साँवल/साँवला
- जमाई से जँवाई
अब बचा मामला पहला, दूसरा और तीसरा का। कोश बताते हैं कि पहला प्रथम से बना। प्रथम से प्रथमिल होते हुए प्राकृत में पहिलो या पहिल्ल हुआ और उससे हिंदी में पहला बना।

दूसरा और तीसरा के बारे में कोश से कोई सहायता नहीं मिली। यहाँ भी योगेंद्र जी मददगार रहे। उन्होंने बताया कि संस्कृत में एक शब्द है त्रिस् जिसका अर्थ है तीन बार। उसी से संभवतः तीसरा बना और तीसरा की देखादेखी द्वि या द्वय में भी ‘सरा’ जोड़कर दूसरा बना दिया गया।