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आलिम सर की हिंदी क्लास शुद्ध-अशुद्ध

77. अनवरत का उच्चारण अन्+वरत् या अनव्+रत्?

यह क्लास कुछ अलग क़िस्म की है। अलग इस मायने में कि इसमें हम किसी शब्द की वर्तनी या लिंग के बारे में नहीं, उसके उच्चारण के बारे में जानेंगे। शब्द है अनवरत और सवाल यह कि इसे अन्+वरत बोलेंगे या अनव्+रत। इस विषय में फ़ेसबुक पर हुए पोल में 80% ने कहा – अन्+वरत सही है। लेकिन वे ग़लत हैं। क्यों, जानने के लिए आगे पढ़ें।

सवाल है – अनवरत को कैसे बोला जाएगा – अन्+वरत या अनव्+रत। जैसा कि आपने पोल के नतीजे से जाना, 80% लोग अन्+वरत बोलते हैं। लेकिन सही उच्चारण है अनव्+रत।

अनवरत का सही उच्चारण अनव्+रत इसलिए है कि यह बना है अन्+अवरत से। अवरत का मतलब है ठहरा हुआ (देखें चित्र) और अन्+अवरत का अर्थ है जो ठहरा हुआ न हो यानी जारी हो। आसान शब्दों में लगातार।

आपमें से कुछ लोग इस पॉइंट पर ठहरकर पूछ सकते हैं कि जब मैं अन्+अवरत को सही बता रहा हूँ तो मैंने पोल में विकल्प के तौर पर अनव्+रत क्यों दिया था और आज भी अनव्+रत को क्यों सही बता रहा हूँ। मुझे दूसरे विकल्प के तौर पर अन्+अवरत देना चाहिए और इसी की बात करनी चाहिए।

सवाल जायज़ है। लेकिन इसका कारण यह है कि मैंने अपने पोल में शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में सवाल नहीं पूछा था और इस लेख में भी मूल सवाल उच्चारण का है, व्युत्पत्ति का नहीं। उच्चारण के मामले में अन्+अवरत और अनव्+रत एक जैसे हैं। ठीक वैसे ही जैसे अन्+अंत और अ+नंत उच्चारण के मामले में बिल्कुल एक हैं। यदि पोल में मैंने अनव्+रत की जगह अन्+अवरत का विकल्प दे दिया होता तो कई साथियों को सही जवाब का क्लू मिल जाता और मैं क्लू देना नहीं चाहता था।

हाँ, व्युत्पत्ति की बात करना भी ज़रूरी है क्योंकि तभी हम समझेंगे कि क्यों अन्+वरत उच्चारण ग़लत है और क्यों अनव्+रत उच्चारण सही है। परंतु वह समझने से पहले यह जानना उचित होगा कि 80% हिंदीभाषी अनवरत को अनव्+रत की जगह अन्+वरत क्यों बोलते हैं।

ग़लती का सबसे बड़ा कारण

सबसे पहला और बड़ा कारण है अ-लोप का सिद्धांत जिसपर हम पहले भी अतिशयोक्ति/अतिश्योक्ति, मदरसा/मद्रसा, उलटी/उल्टी और बदरी/बद्री वाली क्लासों में चर्चा कर चुके हैं। जिन्होंने वे क्लासें न पढ़ी हों, उनके लिए संक्षेप में उसी बात को दोहरा देते हैं।

1. हिंदी में शब्दों के आख़िर में मौजूद ‘अ’ स्वर का लोप हो जाता है यानी उसका उच्चारण नहीं होता। जैसे रात, दिन, काल में त, न और ल में अ-स्वर है लेकिन बोलते समय उनकी स्वरमुक्त यानी व्यंजन वाली ध्वनि ही बोली जाएगी, उनके साथ लगा ‘अ’ स्वर नहीं बोला जाएगा। यानी उन्हें रात्अ, दिन्अ या काल्अ नहीं बोला जाएगा। प्रिय, सुन्न जैसे शब्द जिनके अंत में ‘य’ है या कोई संयुक्ताक्षर हैं, वे अपवाद हैं।

2. दो से अधिक वर्णों वाले शब्दों को तोड़कर बोला जाता है। इन अलग-अलग टुकड़ों को शब्दांश (syllable) कहते हैं। तकनीकी भाषा में यही अक्षर भी कहे जाते हैं। जैसे राघव में रा और घव दो शब्दांश (अक्षर) हैं। प्रचार में प्र और चार दो शब्दांश (अक्षर) हैं। राजमहल में राज, म और हल – ये तीन शब्दांश (अक्षर) हैं।

3. जब इन शब्दांशों के अंत में ‘अ’ स्वर वाली कोई ध्वनि होती है तो उसमें भी अ-स्वर का लोप हो जाता है। जैसे अवतरण में बोलने के लिहाज़ से अव, त और रण – ये तीन टुकड़े बनते हैं। इनमें रण के अंत में मौजूद ‘ण’ को तो व्यंजन की तरह बोला ही जाएगा (देखें पॉइंट-1) लेकिन अव के अंत में मौजूद ‘व’ को भी व्यंजन की तरह ही बोला जाएगा क्योंकि वह उस शब्दांश के अंत में है। यही बात राज+महल, जग+मोहन, काम+चोर आदि में भी लागू होती है। इन तीनों में ज, ग और म के साथ अ-स्वर है लेकिन उनको व्यंजन की तरह बोला जाएगा कुछ इस तरह – राज्महल, जग्मोहन और काम्चोर।

यहाँ तक तो बात आपकी समझ में आ रही होगी। शब्दांश कैसे बनते हैं, यह भी आपने देख लिया। लेकिन कई बार शब्दांश कैसे बनाएँ, यह स्पष्ट नहीं होता। राजमहल, जगमोहन और कामचोर में यह आसान है क्योंकि हम राज, जग और काम जैसे शब्दों से वाक़िफ़ हैं। लेकिन नक़बजनी (नक़्+बज्+नी या न+क़ब्+जनी?), बदरी (बद्+री या ब+द+री?) जैसे शब्दों में मुश्किल आ जाती है क्योंकि हमें पता नहीं रहता कि ये शब्द कैसे बने हैं।

यही बात अनवरत में है। इस शब्द को तोड़ने के दो तरीक़े हैं। अन्+व+रत् और अ+नव्+रत्। कौन इसका क्या उच्चारण करेगा, यह इसपर निर्भर करता है कि बोलने वाले को इसकी व्युत्पत्ति की जानकारी है या नहीं।

  • जो जानते हैं कि यह शब्द अवरत के आगे अन् लगने से बना है, वे इसका सही उच्चारण करते हैं – अन्+अवरत।
  • जो नहीं जानते, वे अन्+वरत बोलते हैं।

वे अन्+वरत सिर्फ़ इसलिए नहीं बोलते हैं कि उनको इस शब्द की व्युत्पत्ति की जानकारी नहीं है। वे अन्+वरत इसलिए भी बोलते हैं कि हिंदी में ‘अन’ से शुरू होने वाले बहुत सारे शब्द हैं जिनमें लिखते तो हैं ‘अन’ लेकिन बोलते हैं ‘अन्’। नीचे ऐसे शब्द देखें।

  • अन+जाना=अनजाना (उच्चारण>अन्जाना।
  • अन+चाहा=अनचाहा (उच्चारण>अन्चाहा।
  • अन+देखा=अनदेखा (उच्चारण>अन्देखा।
  • अन+ब्याहा=अनब्याहा (उच्चारण>अन्ब्याहा।
  • अन+कहा=अनकहा (उच्चारण>अन्कहा।

इसी तरह अनवरत में उन्होंने ‘अन्’ का उच्चारण समझ लिया और बोलने लगे अन्वरत।

अन् और अन – दो उपसर्ग, दो उच्चारण

यह अन् और अन का चक्कर लोगों को ख़ूब परेशान करता है। ये दोनों ही नकारबोधक उपसर्ग हैं यानी जिस शब्द से पहले लगते हैं, उनका विपरीत अर्थ देते हैं। लेकिन दोनों में एक बहुत बड़ा फ़र्क़ है – ‘अन्’ संस्कृतमूलक शब्दों में लगता है और ‘अन’ देशज शब्दों में। ‘अन’ जिन शब्दों के आगे लगता है, वहाँ कोई संधि नहीं होती जबकि ‘अन्’ वाले शब्दों में संधि होती है।

‘अन्’ में न आधा, उच्चारण पूरा

जैसा कि ऊपर बताया, संस्कृत के शब्दों में हमेशा अन् लगता है लेकिन शब्द के अंदर ‘न’ का उच्चारण हमेशा पूरा होता है। कारण यह कि ‘अन्’ में ‘न्’ भले ही स्वरमुक्त हो परंतु उसके बाद में हमेशा कोई-न-कोई स्वर आता है (‘अन्’ हमेशा स्वर से शुरू होने वाले शब्दों के पहले लगता है; व्यंजनों के आगे ‘अ’ या कोई और उपसर्ग जैसे ‘वि’, ‘निः’, ‘प्रति’ आदि आते हैं), इसलिए शब्द में उसका उच्चारण हमेशा न (न्+अ) होता है। उदाहरण – अन्+अधिकृत=अनधिकृत।

‘अन’ में न पूरा, उच्चारण आधा

इसके विपरीत हिंदी का जो ‘अन’ उपसर्ग है, उसमें ‘न’ पूरा है यानी स्वरयुक्त है मगर उसका उच्चारण हमेशा आधा होता है – न् जैसा। उदाहरण आपने ऊपर देखे ही। एक बार फिर देख लीजिए – अनजाना (अन्जाना), अनचाहा (अन्चाहा), अनदेखा (अन्देखा)।

आप चाहें तो इसे एक सूत्र के रूप में याद रख सकते हैं कि संस्कृत के शब्दों में (नकारबोधक) ‘अन्’ से शुरू होने वाले शब्दों में ‘न’ की ध्वनि का उच्चारण पूरा होगा (न जैसा) जबकि हिंदी के देशज शब्दों में (नकारबोधक) ‘अन’ से शुरू होने वाले शब्दों में ‘न’ की ध्वनि का उच्चारण हमेशा आधा होगा (न् जैसा)। यानी बिल्कुल उलटा। जहाँ न् (अन्) है, वहाँ न और जहाँ न (अन) है, वहाँ न्। लेकिन यह फ़ॉर्म्युला तभी काम करेगा अगर आप संस्कृतमूलक और देशज शब्दों में अंतर करना जानते हों।

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One reply on “77. अनवरत का उच्चारण अन्+वरत् या अनव्+रत्?”

हिन्दी शब्दसागर में विद्यमान सैकडों त्रुटियों के बारे में उसके सम्पादक-द्वय रामचन्द्र शुक्ल और रामचन्द्र वर्मा को पता था।शुक्ल जी ने इसे सुधारने का आदेश/ निर्देश /आशीर्वाद रामचंद्र वर्मा जी को दिया था।
लेकिन नये संस्करण के प्रकाशन के समय नागरी प्नचारिणी सभा के नये (क्षुद्राशय)व्यवस्थापकों ने वर्मा जी को इसकी अनुमति नहीं दी ।

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