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आलिम सर की हिंदी क्लास शब्द पहेली

172. साम-दा*-दंड-भेद में साम के बाद दाम या दान?

हेडिंग में पूछा गया सवाल देखकर आप सोच रहे होंगे कि यह भी क्या सवाल हुआ। यह तो हर कोई जानता है कि ‘साम-दाम-दंड-भेद’ ही होता है, न कि ‘साम-दान-दंड-भेद’। यानी दूसरे नंबर पर दाम है, न कि दान। फ़ेसबुक पर हमारे साथियों ने भी यही जवाब दिया जब हमने उनसे यह सवाल पूछा था। लेकिन क्या यह सही जवाब है? जानने में रुचि हो तो आगे पढ़ें।

कई साथी सोच रहे होंगे कि आज की चर्चा किसी काम की नहीं क्योंकि हर कोई जानता है कि सही क्या है। फ़ेसबुक पर इस संबंध में किए गए पोल में भाग लेने वाले 92% साथियों को भी यही लगा कि ‘साम-दाम-दंड-भेद’ सही है।

लेकिन मुझे अमिताभ बच्चन की तरह कहना होगा – अफ़सोस… ग़लत जवाब। सही जवाब वह है जिसके पक्ष में केवल 8% ने वोट दिया यानी दान।

जी हाँ, सही विकल्प है दान। साम-दान-दंड-भेद। पुराने ग्रंथों में यही मिलता है। मेरे पास तीन संदर्भ ग्रंथ हैं। ‘मत्स्यपुराण’ जिसकी रचना का अनुमानित समय आज से 1500 से 2000 साल पहले का है। दूसरा, ‘किरातार्जुनीयम्’ जो सातवीं शताब्दी में लिखा गया समझा जाता है। तीसरा, तुलसीदास रचित ‘रामचरितमानस’ जो क़रीब 500 साल पहले का ग्रंथ है।

वैसे तो मुझे शुरुआत ‘मत्स्यपुराण’ से करनी चाहिए क्योंकि वह सबसे पुराना ग्रंथ है लेकिन मैं ‘रामचरितमानस’ से शुरू करता हूँ क्योंकि ‘मत्स्यपुराण’ के हवाले से मुझे और भी कुछ बताना है।

‘रामचरितमानस’ के लंकाकांड में तुलसी अंगद के मुँह से कहलवाते हैं।

साम दान अरु दंड बिभेदा। 
नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा।।

इसी तरह ‘किरातार्जुनीयम्’ में भी नीति के तौर पर ‘साम’ के साथ ‘दान’ की ही बात की गई है, ‘दाम’ की नहीं (देखें चित्र)।

अब आते हैं ‘मत्स्यपुराण’ पर। इसका गीता प्रेस वाला संस्करण मुझे इंटरनेट से मिला और मैं वहीं से आगे का हिस्सा उठा रहा हूँ। इसमें जब मनु मत्स्यावतार भगवान से साम आदि उपायों और उनके लक्षणों व प्रयोगों के बारे में पूछते हैं तो भगवान कहते हैं – मनुजेश्वर! (राजनीति में) साम (स्तुति-प्रशंसा), भेद, दान, दंड, उपेक्षा, माया तथा इंद्रजाल – ये सात प्रयोग बतलाए गए हैं (देखें चित्र)।

आपने देखा, यहाँ भी दान ही है।

अब प्रश्न उठता है कि दान का दाम कैसे हो गया। इसके बारे में मेरे विचार वही हैं जो मेरे भाषामित्र योगेंद्रनाथ मिश्र के हैं। यह राय उन्होंने वॉट्सऐप पर दी जिसका स्क्रीनशॉट मैं नीचे लगा रहा हूँ।

चलिए, ‘दान’ और ‘दाम’ का मसला तो हल हो गया लेकिन दो और ऐसे मसले हैं जिनपर बात करना मैं ज़रूरी समझता हूँ। वे हैं – ‘साम’ और ‘भेद’ के अर्थ। अधिकतर लोग ‘साम’ का अर्थ समानता (साम्य) से लेते हैं यानी जिसे आप अपने अनुकूल करना चाहते हैं, उससे दोस्ती या सुलह कर लें। लेकिन ‘मत्स्यपुराण’ जो हमारी चर्चा में आया सबसे पुराना ग्रंथ है, उसमें ‘साम’ का अर्थ समानता नहीं, स्तुति या प्रशंसा है। राजपाल के हिंदी कोश में भी साम का यही अर्थ दिया गया है (देखें चित्र)।

परंतु यह स्तुति या प्रशंसा चापलूसी के तौर पर की जाए तो यह हर बार कामयाब नहीं होती, यह भी ‘मत्स्यपुराण’ में स्पष्ट कर दिया गया है।

ग्रंथ के अनुसार मनु के प्रश्न का जवाब देते हुए भगवान आगे कहते हैं –

‘साम तथ्य तथा अतथ्यभेद से दो प्रकार का कहा गया है। उसमें भी अतथ्य साम (झूठी प्रशंसा) साधु पुरुषों की अप्रसन्नता का कारण बन जाती है। नरोत्तम, इसीलिए सज्जन व्यक्ति को प्रयत्नपूर्वक तथ्य साम (सच्ची प्रशंसा) से वश में करना चाहिए। …उनके कुल और शील-स्वभाव का वर्णन, किए गए उपकारों की चर्चा तथा अपनी कृतज्ञता का कथन करना चाहिए। …यद्यपि राक्षस भी सामनीति के द्वारा वश में किए जाते हैं – ऐसी पराश्रुति है तथापि असतपुरुषों के प्रति इसका प्रयोग उपकारी नहीं होता। दुर्जन पुरुष साम की बातें करने वाले को अतिशय डरा हुआ समझते हैं, इसलिए उनके प्रति इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

इसी तरह ‘भेद’ के बारे में भी लोगों में भ्रम है। भेद का अर्थ लोग जासूसी समझते हैं यानी दुश्मन के इलाक़े में गुपचुप जाकर उसके भेदों का पता लगाना।

लेकिन ‘मत्स्यपुराण’ के अनुसार यहाँ भेद का दूसरा अर्थ है। इसका अर्थ दुश्मन का भेद जानना नहीं बल्कि उसमें फूट डालना है। आइए, देखते हैं, ग्रंथ में भेदनीति के बारे में क्या कहा गया है।

भगवान ने कहा –

‘जो परस्पर वैर रखने वाले, क्रोधी, भयभीत तथा अपमानित हैं, उनके प्रति भेदनीति का प्रयोग करना चाहिए। …उनके प्रति अपनी और से आशा प्रकट करें और दूसरे से भय की आशंका दिखलाएँ। इस प्रकार उन्हें फोड़ लें और अपने वश में कर लें।’

इसमें आगे कहा गया है कि किस तरह राजाओं में आपसी फूट करवाने से बेहतर है राजाओं के अंतःपुर में फूट डालना। लिखा गया है – जहाँ राजाओं के सम्मुख आंतरिक कोप और बाहरी कोप दोनों उपस्थित हों, वहाँ बाहरी कोप ही महान है क्योंकि वह राजाओं के लिए विनाशकारी होता है।

‘छोटे राजाओं का क्रोध राजा के लिए बाह्य कोप कहा गया है तथा रानी, युवराज, सेनापति, अमात्य, मंत्री और राजकुमार के द्वारा किया गया क्रोध आंतरिक कोप कहा गया है। इन सबों का कोप राजाओं के लिए भयानक बतलाया गया है। महाभाग! अत्यंत भीषण बाह्य कोप के उत्पन्न होने पर भी यदि राजा का अंतःपुर (महारानी, युवराज, मंत्री आदि) शुद्ध एवं अनुकूल है तो वह शीघ्र ही विजय लाभ करता है। लेकिन यदि राजा इंद्र के समान हो तो भी वह अंतःपुर के कोप से नष्ट हो जाता है।’

चलिए, अब तो आपको स्पष्ट हो गया होगा कि ‘साम’ और ‘भेद’ का यहाँ क्या अर्थ है और यह भी कि प्राचीन ग्रंथों में ‘साम-दान-दंड-भेद’ ही है भले ही हिंदी में ‘साम-दाम-दंड-भेद’ चल गया हो।

अब प्रश्न यह बचता है कि हिंदी में क्या लिखा जाए – दाम या दान। मिश्र जी का मत है कि आज की राजनीति में जिस तरह पैसे देकर लोगों का समर्थन ख़रीदा जा रहा है, उसके लिए ‘दान’ के बजाय ‘दाम’ शब्द ही ज़्यादा उपयुक्त प्रतीत होता है क्योंकि यहाँ उस व्यक्ति का या उसकी वफ़ादारी का दाम लगाया जा रहा है।

मिश्र जी की बात सही है। आप ग़ौर करेंगे तो ‘दाम’ और ‘दान’ के अर्थ में बड़ा अंतर है। ‘दाम’ में रिश्वत का पुट है, जबकि ‘दान’ से उदारतापूर्वक की गई आर्थिक मदद का भान होता है।

दाननीति के बारे में आपको और जानना हो तो ‘मत्स्यपुराण’ का 224वाँ अध्याय पढ़ सकते हैं जो दाननीति पर ही है। इस लिंक पर क्लिक या टैप करेंगे तो वह आपको सीधे उसी अध्याय पर ले जाएगा।

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