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आलिम सर की हिंदी क्लास शब्द पहेली

36. क्ष से क्छत्रिय या क्शत्रिय, रक्छा सही या रक्शा?

हिंदी वर्णमाला में एक संयुक्त वर्ण है क्ष जिसका दो तरह से उच्चारण किया जाता है – क्छ और क्श। मसलन रक्षा को कहीं रक्छा बोला जाता है, कहीं रक्शा। क्षमा को कहीं क्छमा बोला जाता है तो कहीं क्शमा।आख़िर क्ष का सही उच्चारण क्या है? क्छ, क्श या कुछ और? जानने के लिए आगे पढ़ें।

जब मैंने क्ष के उच्चारण पर फ़ेसबुक पोल किया तो मैंने दो विकल्प दिए – क्छ और क्श। 28% ने क्छ के पक्ष में वोट डाला, 72% ने क्श के पक्ष में। अब इसमें सही क्या है? सच कहूँ तो इनमें से कोई नहीं। यदि क्ष की मूल ध्वनि पर जाएँ तो यह क् और ष के मेल से बना है, इसलिए इसका शुद्ध उच्चारण न क्छ है, न क्श।

पोल के दौरान कई साथियों ने अपने कॉमेंट में र+क्+षा लिखकर इस तरफ़ इशारा भी किया था। देखें चित्र में उनके कॉमेंट।

लेकिन मैंने इसे विकल्प के तौर पर नहीं दिया। दो कारणों से। एक, क् और ष (क्+ष) को मिलाकर लिखते ही क्ष हो जाता था और आप समझ नहीं पाते कि मैं किस ध्वनि की बात कर रहा हूँ। दो, योगेंद्रनाथ मिश्र जैसे भाषाविदों का मानना है कि आज की तारीख़ में कोई भी हिंदीभाषी ‘ष’ का वास्तविक उच्चारण नहीं कर रहा और ष वाले शब्दों में जो ध्वनि वह निकाल रहा है, वह दरअसल श ही है। दूसरे शब्दों में ष से षट्कोण बोलते समय वह श से शटकोण ही बोल रहा होता है। पढ़ें मिश्रजी का का यह संक्षिप्त पोस्ट  जो ष के उच्चारण के बारे में है।

वैसे विकिपीडिया पर मौजूद इस पेज पर – https://hi.wikipedia.org/wiki/ष – श और ष की ध्वनियाँ दी गई हैं। आप सुनकर दोनों का अंतर पहचान सकते हैं और ख़ुद तय कर सकते हैं कि आप रक्षा बोलते समय र+क्+षा बोलते हैं या र+क्+शा।

परिभाषा के हिसाब से श बोलते समय हमारी जीभ तालू का स्पर्श करती है (इसीलिए इसका नाम है तालव्य श) जबकि ष बोलते समय मूर्धा का (इसीलिए इसे कहते हैं मूर्धन्य ष)। कुछ लोग पूछ सकते हैं कि यह मूर्धा (या मूर्द्धा) क्या है। तो मू्र्धा तालू के और भी पीछे का हिस्सा है। ट-ठ-ड-ढ-ण बोलते समय आपकी जीभ तालू के जिस हिस्से का स्पर्श करती है, तक़रीबन वही मूर्धा है। इसी कारण टवर्ग की सारी ध्वनियाँ मूर्धन्य कही जाती हैं। लेकिन यहाँ भी भाषाविदों का मत है कि हम आज ट-ठ-ड-ढ-ण जिस तरह बोल रहे हैं, वे शुद्ध मूर्धन्य नहीं हैं क्योंकि हमारी जीभ वास्तविक मूर्धास्थल को स्पर्श नहीं करती, दाँत के पास वाले तालू के ही थोड़ा-सा अंदर के हिस्से को छूती है। कहने का अर्थ यह कि क् और ष को मिलाकर क्ष की जो संयुक्त ध्वनि बननी चाहिए, वह मूर्धन्य है लेकिन हम उसका वैसा उच्चारण नहीं कर पाते जैसा कि किसी ज़माने में किया जाता था।

तो फिर क्ष के दो ही उच्चारण बचे – क्छ और क्श। चूँकि श (छ के मुक़ाबले) ष के ज़्यादा निकट की ध्वनि प्रतीत होती है, इसलिए मेरे हिसाब से क्श ही सही है। यानी रक्षा का उच्चारण रक्शा, क्षत्रिय का उच्चारण क्शत्रिय और शिक्षा का उच्चारण शिक्शा होना चाहिए। मराठी और गुजराती में भी क्ष का यही उच्चारण चलता है।

क्छ और क्श के अलावा भी क्ष का कई अन्य ध्वनिरूपों में परिवर्तन हुआ है। ये रूप हैं –

  1. च्छ – रक्षा का रच्छा, लक्षण का लच्छन
  2. छ – क्षत्र का छत्र, क्षुर से छुरा
  3. क्ख – दक्षिण का दक्खिन, भिक्षु का भिक्खु
  4. ख – शिक्षा से सीख, क्षार से खार, क्षमा का खोमा (बाँग्ला में), लक्ष्मण का लखन
  5. श – क्षेत्र का शेत (मराठी में), क्षीर का शीर (फ़ारसी में)

ये सारे बदलाव आजकल के नहीं हैं। डॉ. भोलानाथ तिवारी अपनी किताब ‘हिंदी भाषा का इतिहास’ में लिखते हैं, ‘सन् 1 ईसवी से सन् 500 ईसवी के बीच क्ष का विकास दो तरह से हुआ। शौरसेनी (यानी मथुरा के आसपास प्रचलित भाषा) में क्ष का क्ख हो गया (इक्षु>इक्खु) जबकि महाराष्ट्री (महाराष्ट्र अंचल में प्रचलित भाषा) में यह च्छ (इक्षु>उच्छु) हो गया।’ बाद में क्ष के उच्चारण में और भी बदलाव हुए जो हम ऊपर के उदाहरणों में देख चुके हैं।

तात्पर्य यह कि पिछले क़रीब डेढ़-दो हज़ार सालों से क्ष का च्छ-छ, क्ख-ख और श में रूपांतर जारी है। यह रूपांतर क्यों हुआ, इसका जवाब भाषाविद ही दे सकते हैं। वैसे मैंने थोड़ा-बहुत पढ़ा, उसके अनुसार ख, छ और श के साथ ष की काफ़ी समानताएँ हैं, एकाध असमानता भी है। ये चारों अघोष हैं (यानी उनके बोलने पर स्वर तंत्रियाँ नहीं काँपतीं), महाप्राण हैं (यानी उनको बोलने समय मुँह से हवा ज़्यादा निकलती है) लेकिन जहाँ ष और श संघर्षी हैं, वहाँ ख नहीं है और छ स्पर्श संघर्षी है।

कुछ समझ में आया? मुझे भी नहीं आया। बस इतना समझा हूँ कि क्ष या ष बोलने के लिए जीभ को जहाँ टच करना होता है, यदि किसी जाति-समाज-समूह के लोग वहाँ टच नहीं कर पाएँ और उनकी जीभ कहीं और स्पर्श करने की आदी हो तो उनके मुँह से अलग ध्वनि निकलती है। जीभ की हरकत और हवा की चाल में फेरबदल से ही ष का उच्चारण छ, ख, श आदि में बदल गया और कुछ समय के बाद स्थायी हो गया। यह परिवर्तन कैसे होता है, इसको समझने के लिए एक आसान प्रयोग करें – अपनी जीभ को दाँत के पास टच करके ट बोलने की कोशिश करें – देखिए, ट की आवाज़ निकलती है या त जैसी।

अब सवाल उन 28% साथियों से जो आज तक क्ष को क्छ बोलते आए हैं। क्या आप क्छ बोलना जारी रखेंगे या आज से क्ष को क्श बोलना शुरू कर देंगे? मेरे सामने भी यह सवाल उठा था आज से कोई तीन दशक पहले जब नौकरी के सिलसिले में कलकत्ता से दिल्ली – वाया मुंबई – आया था और क्ष के इन नए क्श वाले उच्चारण का पता चला था। शुरू-शुरू में रक्छा मंत्री की जगह रक्शा मंत्री बोलना बहुत अटपटा लगा लेकिन धीरे-धीरे आदत हो गई, वैसे ही जैसे ‘हम जा रहे हैं’ की जगह ‘मैं जा रहा हूँ’ बोलने की आदत पड़ गई।

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