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आलिम सर की हिंदी क्लास शब्द पहेली

69. काँ-काँ का जो शोर करे, वह कौआ है या कौवा?

काँव-काँव का शोर करने वाले उस काले पक्षी से कौन परिचित नहीं होगा? लेकिन एक बार उसका नाम बोलकर देखिए। आप कौआ बोल रहे हैं या कौवा? जब इसी विषय पर फ़ेसबुक पर एक पोल किया गया तो 62% ने कौआ और 38% ने कौवा के पक्ष में वोट दिया। सही क्या है, जानने के लिए आगे पढ़ें।

सही क्या है? कौआ या कौवा? यह पता लगाने में उतनी ही मुश्किल आई जितनी कहानी वाले उस कौए/कौवे को मटके की तली में पड़े पानी को ऊपर तक लाने में आई होगी। मुझे भी जवाब तक पहुँचने में अंदाज़ों के कई सारे कंकड़ डालने पड़े और परिणाम के पानी तक पहुँचने के लिए अपने एक मित्र की मदद भी लेनी पड़ी।

मुश्किल इसलिए भी आई कि हर बार मैं शब्दकोश या शब्दस्रोत के आधार पर तय करता था कि कौनसा शब्द सही या ज़्यादा सही है। लेकिन इस बार स्वयं कोशकार भी भ्रम की स्थिति में मिले।

मेरा पसंदीदा कोश है नागरी प्रचारिणी सभा का हिंदी शब्दसागर। उसमें मैंने पहले कौआ खोजा क्योंकि मैं कौआ ही लिखता आया हूँ और मुझे लगा, यही मूल शब्द होगा जिससे आगे जाकर कौवा बना होगा। लेकिन कौआ वाली एंट्री में लिखा था – दे. कौवा।

यह मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी क्योंकि इसका मतलब यह कि इतने सालों तक मैं ग़लत जानता और लिखता आया हूँ। मगर जो कोश में लिखा था, उसे मैं कैसे नकार सकता था! मैं फिर कौवा वाली एंट्री पर गया। वहाँ कौवा शब्द का पूरा अर्थ दिया हुआ था।

इसका मतलब क्या यह हुआ कि कौवा ही सही है, कौआ नहीं?

कोशकार भी भ्रमित

मेरा मन आसानी से इस बात को मानने को तैयार नहीं हो रहा था। कौआ-कौवा की दुविधा में न जाने क्या सोचकर मैं शब्दकोश में काक की एंट्री पर चला गया क्योंकि काक ही वह शब्द है जिससे कौआ या कौवा बना है। जानते हैं, वहाँ काक का अर्थ क्या दिया हुआ था? कौआ।

यह बड़ी अजीब बात थी। एक तरफ़ तो कोशकार कह रहा है कि कौवा सही है, कौआ नहीं। लेकिन जब शब्दकोश में अन्यत्र इस पक्षी का ज़िक्र आता है तो वहाँ वह कौवा नहीं, कौआ और कौओं लिखता है।

इसी से पता चलता है कि इन दोनों शब्दों के बारे में ख़ुद कोश तैयार करने वाले ही किस क़दर कन्फ़्यूज़्ड हैं।

इस भ्रम को दूर करने के लिए मैंने अब दूसरा रास्ता चुना। यानी शब्द के स्रोत पर गया और समय के साथ उसमें क्या-क्या बदलाव आए, यह जानने का प्रयास किया। इस कोशिश में कुछ-कुछ अंदाज़ा लगा पाया लेकिन पूरा नहीं।

काक से बना काओ

शब्दसागर कहता है कि यह शब्द संस्कृत के काक से निकला है। काक से प्राकृत में काओ बना और काओ से कौवा।

प्लैट्स में काओ या कौआ/कौवा का कोई ज़िक्र नहीं है। लेकिन उसमें काक और काग की एंट्री है जिससे पता चलता है कि काक से काग बना, काग से कागु और कागु से कागो या कागओ।

अगर इस कागो या कागओ (प्लैट्स) की काओ (शब्दसागर) से तुलना करते हैं तो ऐसा लगता है कि समय के साथ कागओ का ग हट गया हो और काओ रह गया हो। ऐसा प्रतीत होता है कि इस काओ से ही आगे चलकर कौआ बना। लेकिन फिर यह कौवा कहाँ से आया?

उ और आ के मिलने से निकला व्?

पहले मैंने अपने दिमाग़ के घोड़े दौड़ाए। मुझे लगा, कौआ के कौवा बनने में ‘कौ’ में मौजूद ‘औ’ के उच्चारण का ज़रूर कोई योगदान है। आप सब जानते होंगे कि हिंदी में औ के दो तरह के उच्चारण होते हैं। पश्चिमी भारत में यह मूल स्वर है यानी एक ही स्वर है लेकिन पूर्वी भारत में यह द्विस्वर (दो स्वरों) के रूप में बोला जाता है। यह द्विस्वर भी दो तरह का है। एक अओ (कौन>कओन, औरत>अओरत, कौशल्या>कओशल्या आदि), दूसरा अउ (पौआ>पउआ, हौआ>हउआ आदि)। पौआ और हौआ की तरह कौआ को भी कउआ बोला जाता है, कम-से-कम पूर्वी भारत में।

मैंने सोचा कि क्या ‘उ’ और ‘आ’ के साथ ‘व्’ का कोई रिश्ता है। मुझे अचानक स्वर संधि का एक नियम याद आ गया कि ‘उ’ के बाद ‘अ’ या ‘आ’ हो तो ‘उ’ का ‘व्’ हो जाता है। उदाहरण – तनु+अंगी=तन्वंगी, अनु+अय=अन्वय। इसी तरह अंग्रेज़ी में पाउ (pow) और अर (er) के मिलने से पाउ+अर>पावर की ध्वनि निकलती है।

एक वाक्य में इसका अर्थ यह हुआ कि जब ‘उ’ और ‘अ’/‘आ’ साथ-साथ आते हैं तो ‘उ’ ‘व्’ में बदल जाता है।

लेकिन कौआ>कउआ के मामले में ‘उ’ स्वर ‘व्’ की ध्वनि में नहीं बदल रहा। बदल रहा होता तो नया शब्द बनता कउ+आ>कव्+आ>कव्आ या कवा, न कि कउवा (कौवा)।

जब मेरे दिमाग़ के घोड़े दौड़ते-दौड़ते थक गए तो मैंने अपने भाषामित्र योगेंद्रनाथ मिश्र की और रुख किया और उनके सामने अपनी शंका रखी। उन्होंने जो जवाब दिया, उसने न केवल मेरी सारी दुविधा समाप्त कर दी बल्कि स्वर और ध्वनि के विषय को एक नए नज़रिए से देखने का रास्ता भी प्रशस्त किया।

कौआ और कौवा : शब्द दो, उच्चारण एक

उन्होंने कहा कि कौआ और कौवा, लिखने में तो ये दो तरह से दिखते हैं लेकिन दोनों का उच्चारण एक ही है – कौवा।

चौंक गए ना? मैं भी चौंक गया था लेकिन जब बोलकर देखा तो पाया कि बिल्कुल सही है। कौआ बोलता हूँ तो भी मुँह से कौव्आ यानी कौवा ही निकलता है। आप भी बोलकर देखिए।

मिश्र जी के अनुसार इसका कारण यह है कि जब हमारा ध्वनितंत्र ‘औ’ के बाद ‘आ’ बोलने का प्रयास करता है तो बीच में अपने-आप ‘व्’ की ध्वनि आ जाती है। यानी हम जब कौआ बोलते हैं तो कौ के ‘औ’ स्वर के बाद तथा अगले ‘आ’ स्वर के बीच बिना कोई प्रयास किए भी ‘व्’ की ध्वनि उत्पन्न हो जाती है। इसी कारण कौआ का उच्चारण कौ+(व्)+आ अर्थात् कौवा हो जाता है।

मिश्र जी की इस व्याख्या से मुझे समझ में आया कि शुरुआती शब्द भले कौआ रहा होगा लेकिन चूँकि कौआ का उच्चारण कौवा होता था, इसलिए बाद में कौवा भी चल निकला हालाँकि लेखन में अब भी कौआ ही ज़्यादा प्रचलित है जैसा कि हमारे पोल से मालूम हुआ।

व् की ध्वनि क्यों?

लेकिन एक सवाल बचा रह गया। वह यह कि ‘औ’ के बाद ‘आ’ बोलने पर ‘व्’ की ध्वनि क्यों निकलती है। इसके उत्तर में मिश्र जी कहते हैं कि उ, ओ, औ और व् – इन चारों ध्वनियों के उच्चारण में दोनों होठों की केन्द्रीय भूमिका होती है। इसी कारण से ये चारों ध्वनियाँ परस्पर शिफ्ट होती रहती हैं। यानी ‘औ’ बोलो तो ‘व्’ की ध्वनि साथ हो लेती है।

मैं इस बात को इस तरह समझा हूँ – जब हम टाइप करते हैं तो कई बार जिस कुँजी (key) को दबाना होता है, उसके पास की कुँजी (key) भी साथ-साथ दब जाती है। शायद इन ध्वनियों के मामले में भी ऐसा ही होता है। ‘औ’ के बाद ‘आ’ बोलना है और ‘आ’ तक पहुँचने से पहले ही मुँह में निकट की एक और कुँजी दब जाती है – ‘व्’ की।

‘व्’ का यह चक्कर केवल कौआ-कौवा तक सीमित नहीं है। यह हर उस शब्द के साथ है जिसमें उ, ओ और औ के बाद आ आता है चाहे वह गोआ/गोवा हो या कछुआ/कछुवा हो।

अब प्रश्न केवल यह बचता है कि किसी शब्द को कैसे लिखा जाए? जिस तरह से वह बना, उस तरीक़े से (यानी कौआ) या जिस तरह से वह बोला जाता है, उस तरीक़े से (कौवा)?

इस पर चर्चा फिर कभी। हाँ, अगर आप कॉमेंट में इस बारे में कुछ लिखना चाहते हों तो आपका स्वागत है।

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