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254. ख़ुशफ़हमी क्या है? ग़लतफ़हमी क्या है?

‘अधिकतर धर्मावलंबी आजीवन इसी ख़ुशफ़हमी/ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि उनका धर्म सबसे अच्छा है।’ इस वाक्य में ‘ख़ुशफ़हमी’ लिखना सही है या ‘ग़लतफ़हमी’ या फिर दोनों में से कोई भी शब्द लिखा जा सकता है? जानने के लिए आगे पढ़ें।

जब यही सवाल हिंदी कविता के फ़ेसबुक पेज पर पूछा गया तो 48% यानी आधे से कुछ कम ने कहा – यहाँ ख़ुशफ़हमी भी लिखा जा सकता है और ग़लतफ़हमी भी। शेष बचे 52% में से ज़्यादातर (32%) का मत था कि इस वाक्य में ख़ुशफ़हमी लिखना उचित है। बाक़ी 20% ने ग़लतफ़हमी का साथ दिया।

सही क्या है, इसका निर्णय करने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि दोनों शब्द का एक ही मतलब है यानी दोनों समानार्थी हैं या अलग-अलग मतलब अर्थात दोनों परस्परविरोधी हैं।

पहले ‘ग़लतफ़हमी’ का अर्थ समझते हैं। मुझे मालूम है कि आप सभी इसका मतलब जानते होंगे लेकिन किसी निर्णायक फ़ैसले तक पहुँचने के लिए आज सोदाहरण और विस्तृत बातचीत ज़रूरी है। इसी चक्कर में यह चर्चा कुछ लंबी हो गई है।

‘ग़लतफ़हमी’ शब्द बना है ग़लत और फ़हम से। ‘ग़लत’ का अर्थ आप जानते हैं – जो सही या सत्य न हो और ‘फ़हम’ का अर्थ है समझ। इस तरह ग़लतफ़हमी का मतलब हुआ अपने या किसी और के बारे में कोई ऐसी समझ या धारणा जो ग़लत हो। दूसरे शब्दों में कोई भी भ्रांत धारणा।

ध्यान दीजिए –

  1. यह भ्रांत धारणा सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी। अर्थात ‘अच्छी’ भी हो सकती है और ‘बुरी’ भी।
  2. यह भ्रांत धारणा ‘अपने’ बारे में हो सकती है और ‘किसी और’ के बारे में भी।

दो उदाहरण देखिए। पहला, कैसे किसी को अपने बारे में भ्रांत धारणा हो सकती है। दूसरा उदाहरण, कैसे किसी को किसी और के बारे में भ्रांत धारणा हो सकती है।

  • नारद विवाह मंडप में ख़ुद को सुंदर समझ रहे थे – यह अपने बारे में सकारात्मक भ्रांत धारणा थी। (कथा मालूम न हो तो यहाँ पढ़ें।)
  • लंका में सीता की खोज में आए हनुमान को रावण ने एक सामान्य बंदर समझा, यह रावण की हनुमान (यानी किसी और) के बारे में नकारात्मक भ्रांत धारणा थी।

अब आगे चलते हैं। पहले नकारात्मक यानी बुरी धारणा के बारे में बात करते हैं।

आपको अपनी कलाई घड़ी नहीं मिल रही जो नहाते समय आपने बाथरूम में उतारी थी। आपको तुरंत ख़्याल आया, कहीं महरी ने तो नहीं चुरा ली… या फिर दोपहर में AC फ़िट करने के लिए जो लड़के आए थे और हाथ धोने के लिए बाथरूम में गए थे, उनमें से तो किसी ने घड़ी नहीं उठा ली। यहाँ आपने महरी या AC लगाने वालों के बारे में एक बुरी धारणा बनाई लेकिन अभी इसे ग़लतफ़हमी नहीं कहा जा सकता क्योंकि आपकी धारणा असत्य साबित नहीं हुई है।

शाम का अचानक आपकी बेटी आपसे कहती है, “पापा (या ममा), आपने अपनी घड़ी बाथरूम में छोड़ दी थी। मैंने उसे अलमारी में रख दी थी। आपको मिली?”

सुनते ही आपको दोहरी ख़ुशी का एहसास होता है। पहली ख़ुशी घड़ी मिलने की और दूसरी ख़ुशी महरी पर विश्वास बहाल होने की। यदि आप संवेदनशील और न्यायप्रिय होंगे तो आपको ख़ुद पर गहरा अफ़सोस होगा, पछतावा होगा कि आपने बिना किसी प्रमाण के महरी और AC लगाने वालों को चोर समझा।

अब आपकी उस बुरी धारणा को हम ‘ग़लतफ़हमी’ कह सकते हैं क्योंकि महरी या AC लगाने वालों को चोर समझकर आपने उनके बारे में जो ‘बुरी’ धारणा बनाई थी, वह असत्य निकली।

कहने का अर्थ यह कि अपने या किसी और के बारे में कोई नकारात्मक धारणा तभी ग़लतफ़हमी कही जाएगी जब वह ‘असत्य‘ प्रतीत हो या ‘असत्य‘ सिद्ध हो चुकी हो।

अब एक और मिसाल। इस बार किसी के बारे में सकारात्मक या अच्छी धारणा रखने की जो आगे चलकर झूठी साबित हुई।

आपने चुनाव में किसी उम्मीदवार के पक्ष मे वोट दिया क्योंकि वह आपकी पसंदीदा पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहा था। आपकी उसके बारे में ‘अच्छी’ धारणा थी कि वह क्षेत्र के लिए काम करेगा, राज्य के लिए काम करेगा, देश के लिए काम करेगा। यदि आपकी सोच अपनी जाति या अपने धर्म तक ही सीमित है तो यही सोचकर वोट दे सकते हैं कि वह कुछ नहीं तो आपकी जाति या धर्म के लिए तो ज़रूर काम करेगा। यह सब आपकी उसके बारे में ‘अच्छी’ धारणाएँ कही जाएँगी।

देखते-देखते पाँच साल बीत जाते हैं और आपको पता चलता है कि वह तो केवल अपने लिए काम कर रहा था। न आपके इलाक़े की सड़कें ठीक हुईं, न गंदे पानी की समस्या हल हुई। हाँ, उसकी संपत्ति अवश्य दस-बीस गुना बढ़ गई।

यह सच है कि आपके एक वोट से बहुत अंतर नहीं पड़ना था, फिर भी आप पछताएँगे  कि मैंने ऐसे व्यक्ति को क्यों वोट दिया। जब वह आपके घर पर वोट माँगने आया था, तब आपकी उसके बारे में कितनी ‘अच्छी’ धारणा थी जो पाँच साल में उसके ’अकर्मों तथा कुकर्मों’ (omissions & commissions) के चलते ग़लत साबित हुई। इसे भी हम ग़लतफ़हमी ही कहेंगे क्योंकि उस जनप्रतिनिधि के बारे में आपकी सकारात्मक धारणा ‘असत्य‘ साबित हुई है।

निष्कर्ष यह कि धारणा ‘अच्छी’ हो या ‘बुरी’, यदि वह ‘भ्रांत धारणा’ है तो वह ग़लतफ़हमी कही जानी चाहिए क्योंकि दोनों ही स्थितियाँ किसी को ग़लत समझने के कारण पैदा हुई हैं।

लेकिन ऐसा होता नहीं है। ग़लतफ़हमी का सामान्य अर्थ भले ही किसी के बारे में ग़लत समझ (अच्छी या बुरी) हो मगर उसका प्रचलित अर्थ पूर्णतः नकारात्मक ही है। यानी जब आप किसी के बारे में ‘बुरी’ धारणा रखें और वह झूठी निकले, तभी उसे ग़लतफ़हमी कहा जाता है। मद्दाह कोश और हिंदी शब्दसागर दोनों इस शब्द का यही अर्थ बताते हैं – कुधारणा, बदगुमानी, किसी ठीक बात को ग़लत समझना (देखें चित्र)।

Meaning of गलतफहमी in Shabdsagar Hindi Dictionary
हिंदी शब्दसागर में ग़लतफ़हमी का अर्थ।
Meaning of Ghalatfahami गलतफ़हमी in Maddah Urdu-Hindi Dictionary
मद्दाह के उर्दू-हिंदी कोश में ग़लतफ़हमी का अर्थ।

दूसरे शब्दों में अच्छे को बुरा समझा जाए, तभी ग़लतफ़हमी शब्द का प्रयोग होगा।

इसीलिए एक ऐसे शब्द की ज़रूरत महसूस की गई जो इसके विपरीत अर्थ के लिए इस्तेमाल किया जा सके करे। जो हमारे उदाहरण नं. 2 के मामले में फ़िट हो। जो बुरे को अच्छा समझने के भ्रम का अर्थ दे।

इसी ज़रूरत को पूरा करता है ख़ुशफ़हमी जो ख़ुश (अच्छा) और फ़हम (समझ) से मिलकर बना है। ख़ुशफ़हमी का सामान्य अर्थ हुआ – अच्छी समझ। मद्दाह कोश ख़ुशफ़ह्मी (उर्दू में यही स्पेलिंग है) का यही अर्थ बताता भी है – तीव्र बुद्धि, अक़्ल की तेज़ी (देखें चित्र)। लेकिन कोश में इसका जो तीसरा अर्थ दिया हुआ है, हिंदी में वही प्रचलित है – किसी के प्रति अच्छा गुमान (देखें चित्र)। अपने या किसी और के बारे में अच्छी धारणा जो असत्य हो।

ख़ुशफ़ह्म और ख़ुशफ़ह्मी का मतलब मद्दाह के उर्दू-हिंदी शब्दकोश में।
मद्दाह के उर्दू-हिंदी शब्दकोश में ख़ुशफ़ह्म और ख़ुशफ़ह्मी का अर्थ।

इस तरह – ग़लतफ़हमी और ख़ुशफ़हमी – ये दोनों एक जैसा अर्थ – भ्रांत धारणा – प्रकट करने के बावजूद दो विपरीत परिस्थितियों में ही इस्तेमाल किए जा सकते हैं। किसी के बारे में बुरी धारणा जो असत्य हो – ग़लतफ़हमी। किसी के बारे में अच्छी धारणा जो असत्य हो – ख़ुशफ़हमी।

अब आते हैं अपने मूल मुद्दे पर। ‘अधिकतर धर्मावलंबी आजीवन इसी ख़ुशफ़हमी/ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि उनका धर्म सबसे अच्छा है।’ हमें तय करना है कि इस वाक्य में ‘ख़ुशफ़हमी’ लिखेंगे या ‘ग़लतफ़हमी’। 

इसके लिए हम कुछ सवाल पूछते हैं। वाक्य के अनुसार –

  1. अधिकतर धर्मावलंबी क्या मानते हैं? अपने धर्म को ‘सबसे अच्छा’ मानते हैं।
  2. अपने धर्म के प्रति यह कैसी धारणा है? ‘अच्छी’ और ‘सकारात्मक’ धारणा है।
  3. क्या उनकी यह धारणा ‘सत्य’ है? नहीं, यह धारणा निश्चित रूप से सत्य नहीं है क्योंकि सभी धर्मों में अच्छाइयाँ और कमियाँ हैं और ऐसा कोई सर्वमान्य पैमाना नहीं बना है जिसके आधार पर किसी एक धर्म को सर्वश्रेष्ठ करार दिया जाए।

यदि सवाल नं. 2 और 3 के जवाबों को मिलाकर देखें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि अधिकतर धर्मावलंबियों का अपने धर्म को ‘सबसे अच्छा’ कहना एक ‘अच्छी’ धारणा है जो ‘सत्य’ नहीं है। इसलिए यहाँ ख़ुशफ़हमी होगा।

अब यदि यही वाक्य उलटा होता। मामला दूसरे धर्मों को ‘बुरा या कमतर’ समझने का होता तो यहाँ ग़लतफ़हमी शब्द का इस्तेमाल होता।

फिर से सवाल पूछते हैं।

  1. अधिकतर धर्मावलंबी क्या मानते हैं? दूसरे धर्मों को ‘बुरा या कमतर’ मानते हैं।
  2. दूसरों धर्मों के प्रति यह कैसी धारणा है? ‘बुरी’ और ‘नकारात्मक’ धारणा है।
  3. क्या उनकी यह धारणा ‘सत्य’ है? नहीं, यह धारणा निश्चित रूप से ‘सत्य’ नहीं है क्योंकि सभी धर्मों में अच्छाइयाँ और कमियाँ हैं और ऐसा कोई सर्वमान्य पैमाना नहीं बना है जिसके आधार पर किसी एक धर्म को अच्छा/बेहतर और दूसरे को बुरा/कमतर करार दिया जाए।

यहाँ भी सवाल नं. 2 और 3 के जवाबों को मिलाकर देखें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि अधिकतर धर्मावलंबियों का दूसरे धर्मों को ‘कमतर’ समझना एक ‘बुरी’ धारणा है जो ‘सत्य’ नहीं है। इसलिए यहाँ ग़लतफ़हमी होगा।

आज की चर्चा बहुत लंबी हो गई है। लेकिन चूँकि पोल से पता चला कि इस विषय पर हिंदी जगत में बहुत भ्रम है, इसलिए इसे विस्तार से समझाना पड़ा।

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