Categories
आलिम सर की हिंदी क्लास शुद्ध-अशुद्ध

53. कहीं आप तत्वावधान का ‘व’ खा तो नहीं जाते?

हिंदी के एक कठिन शब्द तत्वावधान को कुछ लोग तत्वाधान भी लिखते और बोलते हैं। हालाँकि यह अभी वैकल्पिक शब्द के रूप में स्वीकार्य नहीं हुआ है और किसी भी शब्दकोश में यह नहीं मिलता। लेकिन हैरत की बात है कि हमारे फ़ेसबुक पोल में 46% ने इसे सही बताया है। आख़िर क्या मतलब है तत्वावधान का और यह तत्वाधान कैसे बना, जानने के लिए आगे पढ़ें।

किसी भी भाषा में कठिन शब्द समय के साथ प्रचलन से हटते चले जाते हैं और उनके वैकल्पिक आसान शब्द उनका स्थान लेते रहते हैं। लेकिन कुछ शब्द हैं जैसे तत्वावधान जो आज भी विकल्पहीनता के कारण बने हुए हैं। हाँ, इस शब्द को आसान करने के चक्कर में कुछ लोगों ने इसका एक वर्ण खा लिया और इसे तत्वाधान कर दिया।

मुझे मालूम था कि तत्वावधान को कई लोग तत्वाधान लिखते और बोलते हैं लेकिन उनकी संख्या इतनी ज़्यादा है, यह मुझे नहीं मालूम था। मुझे लगा था, बहुत कम लोग तत्वाधान पर वोट करेंगे लेकिन हमारे पोल में 46% ने तत्वाधान के पक्ष में वोट डाला। उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसका कारण समझना आसान है। दरअसल ज़बान की प्रवृत्ति होती है कि वह लंबे और कठिन शब्दों को आसान कर दे, कोई मात्रा हटा या बदल दे, कोई ध्वनि ग़ायब कर दे या दो ध्वनियों को मिला दे। तत्वावधान के मामले में कुछ लोगों की ज़बान ने एक व हटा दिया।

जैसा कि ऊपर संकेत किया, सही शब्द है तत्वावधान जिसका अर्थ है – निरीक्षण, जाँच-पड़ताल, देखरेख (देखें चित्र)।

वैसे इस तत्वावधान में भी एक पेच है। कई लोग कहेंगे कि जनाब, सही शब्द तत्वावधान नहीं, तत्त्वावधान है। यानी सिल्अबल के हिसाब से तत्+वा+व+धान नहीं, तत्+त्वा+व+धान। शुरुआती त के बाद दो त्, न कि एक त्। यानी वे कह रहे थे कि इस शब्द में त् का द्वित्व है। द्वित्व यानी किसी ध्वनि का दो बार आना। जैसे पक्का, सच्चा, वैसे ही। ऊपर का चित्र फिर से देखें। शब्दसागर ने भी ब्रैकिट में जो मूल शब्द लिखा है, वह तत्त्वावधान ही है। संस्कृत में यह ऐसे ही लिखा जाता है।

लेकिन हिंदी के साथ परेशानी यह है कि पक्का, सच्चा आदि में जहाँ आप क् और च् की ध्वनि दो बार सुन पाते हैं, वहीं तत्त्व या महत्त्व में नहीं सुन पाते। इसीलिए यह सवाल उठता है कि हिंदी में तत्त्व लिखना सही है या तत्व, महत्त्व या महत्व, तत्त्वावधान या तत्वावधान।

मैं संस्कृत नहीं जानता इसलिए नहीं मालूम कि ये शब्द कैसे बने। अतः इस विषय पर भोलानाथ तिवारी की किताब से मदद लेते हैं। ‘मानक हिंदी का स्वरूप’ नामक अपनी पुस्तक में इसी विषय की चर्चा करते हुए वे तत्व और महत्व शब्दों की उत्पत्ति के बारे में यह बताते हैं।

  • तत्+त्व=तत्त्व।
  • महत्+त्व=महत्त्व।

आपने देखा कि तत् और महत् के अंत में पहले से एक त् है इसलिए उनके बाद यदि त्व लगेगा तो कुल मिलाकर दो त् होंगे शब्दों में। इस सिलसिले में वे पश्चात्ताप का उदाहरण देते हैं जो पश्चात्+ताप से मिलकर बना है और जिसमें हम दो त् लगाते हैं (पश्चात्ताप)। इस हिसाब से तत्त्व और महत्त्व में भी दो त् लगने चाहिए और उनको तत्त्व और महत्त्व लिखा जाना चाहिए। इस तर्क में दम है।

भोलानाथ तिवारी इस चर्चा के दौरान किशोरीदास वाजपेयी का मत भी बताते हैं कि वे इन शब्दों में द्वित्व के विरोधी थे। मैंने खोजा लेकिन मुझे वाजपेयी जी का विस्तृत मत नहीं मिला जिससे पता चलता कि उनकी इस मामले में दलील क्या थी। लेकिन नागरी प्रचारिणी सभा के शब्दकोश में मुझे तत्व और महत्व ही मिले, तत्त्व और महत्त्व नहीं (देखें चित्र)।

शब्दकोश में संस्कृत के मूल रूप भी दे दिए गए हैं लेकिन हिंदी के लिए बिना द्वित्व वाले शब्द ही सही बताए गए हैं। इससे पता चलता है कि विद्वानों में तत्व और महत्व लिखने पर आम सहमति है, तत्त्व और महत्त्व लिखने पर नहीं। लेकिन पश्चात्ताप/पश्चाताप के मामले में वे पश्चात्ताप (दो त) के पक्ष में हैं।

ऐसा क्यों है, यह आसानी से समझा जा सकता है। मामला पूरी तरह उच्चारण का है। संस्कृत में हो सकता है, वैसे बोला जाता हो लेकिन हिंदी में तत्व/तत्त्व या महत्व/महत्त्व बोलते समय आप किसी भी तरह से दो बार त का उच्चारण नहीं कर सकते। महत्+त्व और तत्+त्व बोलने की कोशिश करेंगे तो भी महत्+व और तत्+व का उच्चारण ही निकलेगा (बोलकर देखिए) क्योंकि मिलने वाले दोनों त् स्वरहीन हैं (तत्+त्व। लेकिन पश्चात्ताप बोलने की कोशिश में आप पश्चात्+ताप बोल सकते हैं (बोलकर देखिए) क्योंकि यहाँ दूसरा त (ता) स्वरयुक्त है।

निष्कर्ष यह कि हिंदी में तत्वावधान ही लिखा जाएगा, तत्त्वावधान नहीं। बाक़ी यदि कोई वैसे लिखना चाहे तो उसके लिए कोई रोक नहीं है।

पसंद आया हो तो हमें फ़ॉलो और शेयर करें

4 replies on “53. कहीं आप तत्वावधान का ‘व’ खा तो नहीं जाते?”

कृत्तिवास सही है। त्त् का त् वहीं होता है जहाँ उनके साथ कोई स्वर न हो जैसे तत्त्व, महत्त्व आदि। कृत्ति में दूसरे त् के साथ इ की मात्रा है, इसलिए यहाँ पहले त् का लोप नहीं होगा। इसी तरह संपत्ति, विपत्ति आदि में दोनों त् का उच्चारण होगा।

शुक्रिया ज्ञानवर्धन के लिए।
मजे की बात यह है कि ज्ञानवर्द्धन होगा या ज्ञानवर्धन। इसके लिए मैं आपकी दूसरी क्लास खंगालता हूॅं।

नमस्ते। आपके सवाल का जवाब इस सप्ताह की चर्चा में है।

अपनी टिप्पणी लिखें

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Social media & sharing icons powered by UltimatelySocial