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आलिम सर की हिंदी क्लास शब्द पहेली

100. जागृत सही या जाग्रत? जागृति, जाग्रति या जागर्ति?

जागृत सही है या जाग्रत? हिंदी के शब्दकोश कहते हैं कि जाग्रत सही है। अगला प्रश्न। तो फिर जाग्रत से जाग्रति बनेगा या जागृति? इसपर कोश और विद्वान भी एकमत नहीं है। कोई जागृति को सही बताता है, कोई जाग्रति को और कोई-कोई तो जागर्ति को। जाग्रत/जागृत और जाग्रति/जागृति/जागर्ति के इस पसोपेश में हमें क्या और क्यों लिखना चाहिए, यह जानने के लिए आगे पढ़ें।

जागृत जैसे शब्द पर पोल और चर्चा करने का विचार मुझे कभी नहीं आता यदि मुझे एक युवा मित्र ने यह नहीं बताया नहीं होता कि जिसे मैं सही समझता हूँ – यानी जागृत – वह शब्दकोशों के अनुसार सही नहीं है।

जी हाँ, इस जानकारी से पहले तक मैं भी जागृत को ही सही समझता था जिस तरह हमारे पोल में भाग लेने वाले 60% लोग समझते हैं (देखें ऊपर का चित्र)। जाग्रत जैसा भी कोई शब्द होता है और शब्दकोशों के अनुसार वही सही है, यह जानकारी मुझे सचिन तिवारी ने दी जिनकी भाषाई मामलों में बहुत रुचि है। उन्होंने यह भी बताया कि शब्दकोशों के अनुसार जागृति भी सही नहीं है। लेकिन उसपर चर्चा बाद में। पहले जागृत और जाग्रत का मामला सुलझा लें।

हिंदी शब्दसागर में जागृत नहीं

जब मुझे बताया गया कि संस्कृत में जागृत नहीं, जाग्रत (जाग्रत्) है तो मैंने हिंदी शब्दसागर टटोला, ज्ञानमंडल का कोश देखा, राजपाल के पन्ने पलटे। मैं हैरान रह गया कि शब्दसागर और ज्ञानमंडल में जागृत था ही नहीं। राजपाल में था लेकिन वह एंट्री भी जाग्रत की ओर इशारा करती है (देखें चित्र)।

राजपाल के शब्दकोश में जाग्रत और जागृत

अंतिम कर्फ़र्मेशन के लिए मैं आप्टे के संस्कृत कोश की शरण में गया। उसमें भी जागृत नहीं था, केवल जाग्रत् था। और हाँ, जागरित भी था (देखें चित्र)।

आप्टे के कोश में जाग्रत् और जागरित

यानी संस्कृत के हिसाब से जाग्रत (जाग्रत्) ही सही है, जागृत नहीं। तो फिर यह जागृत आया कहाँ से? और इतना अधिक चल कैसे निकला कि आज मुझ समेत 60% लोग उसी को सही मान रहे हैं? मेरी समझ से इसका कारण वही है जिसकी चर्चा किशोरीदास वाजपेयी ने जागृति के संदर्भ में की है और जिसके बारे में हम अंत में बात करेंगे।

जागृति, जाग्रति या जागर्ति?

अब अगला सवाल। यदि जागृत सही नहीं है और जाग्रत ही सही है तो फिर जागृत से बनने वाला जागृति भी सही नहीं होगा? सही शब्द फिर जाग्रति ही होना चाहिए – जाग्रत से जाग्रति!

जी नहीं, यहाँ भी कुछ लोचा है। सही शब्द, ख़ासकर संस्कृत के हिसाब से जागर्ति है (देखें चित्र)।

अब जागर्ति क्यों सही है, यह डॉ. किशनाराम महिया की भाषा में नीचे समझते हैं।

जागृ धातु के साथ संस्कृत का क्तिन् प्रत्यय जोड़ने से ‘जाग्रोऽविचिण्ल्ङित्सु’ सूत्र से जागृ धातु के ‘गृ’ में स्थित ‘ऋ’ का गुण आदेश होकर ‘जागर्’ बनेगा। अब इसमें क्तिन् प्रत्यय का शेष बचा ‘ति’ मिला लें तो जागर्ति (जागर्+ति) शब्द बनता है।’

जो समझ गए, उनको लख-लख बधाइयाँ। जो नहीं समझे, उनको हिंदी में समझाने का प्रयास करता हूँ। मूल धातु जागृ है जिससे जागने के अर्थ वाले सारे शब्द बने हैं। संस्कृत के एक नियम के हिसाब से जागृ में जो ृ (ऋ) की मात्रा है, वह अर् में बदल जाती है। अब जागृ में से ‘जाग्’ को निकाल देते हैं, फिर बचे हुए ृ (ऋ) को बदलकर अर् कर देते हैं और अंत में दोनों को मिला देते हैं तो क्या बचता है – जाग्+अर्=जागर्। इस जागर् से संज्ञा बनाने के लिए जब उसके अंत में ‘ति’ लगाते हैं तो शब्द बनता है जागर्+ति=जागर्ति। सिंपल।

चलिए, यह भी मान लिया कि संस्कृत के अनुसार विशेषण के रूप में सही शब्द हैं जाग्रत और संज्ञा के रूप में सही है जागर्ति। लेकिन मेरे दिमाग़ में कुछ सवाल कुलबुला रहे हैं और जिनका जवाब मुझे कहीं नहीं मिल पाया है। 

मुद्दा यह है कि जागृ (जागना) में भी ृ है और मृ (मरना), भृ (भरना), धृ (धारण करना), कृ (करना) और वृ (वरण करना) जैसे धातुओं में भी ृ है।। 

मेरी जिज्ञासा यह है कि जिस तरह मृ से मरण (सं) और मृत (वि), भृ से भरण (सं) और भृत (वि), धृ से धरण/धारण (सं) और धृत (वि), कृ से करण (सं) और कृत (वि) और वृ से वरण (सं) और वृत (वि) के जोड़े बनते हैं, उसी तरह जागृ से जागरण (सं) और जागृत (वि) का जोड़ा क्यों नहीं होता? क्यों जागरण से विशेषण बनाने पर जागृत के बजाय जाग्रत (या जागरित) हो जाता है (देखें चित्र)?

मैंने अपना सवाल डॉ. पृथ्वीनाथ पांडेय के सामने रखा जो संस्कृत के अच्छे जानकार हैं। उनका मत था कि जागृत और जाग्रत के मामले में तो जाग्रत् सही है। ध्यान दीजिए, वे जाग्रत को भी अशुद्ध मानते हैं – उनका ज़ोर जाग्रत् पर है यानी बिल्कुल वैसा जैसा संस्कृत में लिखा जाता है – हल् चिह्न के साथ। लेकिन जागृति के मामले में वे सहमत नहीं थे कि वह ग़लत है। उनके अनुसार जागृ में क्तिन् प्रत्यय जुड़ने से जागृति की रचना होती है (देखें चित्र)।

अब यह तो बड़ी मुश्किल हो गई। महिया जी कहते हैं कि जागृ में क्तिन् प्रत्यय जुड़ने से जागर्ति बनेगा, पांडेय जी कहते हैं कि जागृति बनेगा। उधर कोई-कोई शब्दकोश जाग्रति को भी सही बता रहे हैं। तो सही क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि अपने-अपने हिसाब से दोनों या तीनों सही हैं?

वाजपेयी जी का मत

चलिए, इस उलझन से निकलने के लिए हम किशोरीदास वाजपेयी की शरण में जाते हैं। उन्होंने ‘हिंदी शब्द मीमांसा’ में लिखा है – 

”हिंदी की (सरलता की) प्रकृति से अनभिज्ञ होने के कारण कुछ लोगों ने हिंदी में ‘जागर्ति’ लिखना शुरू किया। बोले – संस्कृत में ‘जागर्ति’ होता है! होता होगा! हिंदी एक शब्द के झमेले में क्यों पड़े? लोग फिर ‘स्मृति’ को ‘स्मर्ति’ और ‘कृति’ को ‘कर्ति’ लिखने लगें तो? क्या सभी लोग पहले संस्कृत का महाव्याकरण पढ़कर आएँ, तब हिंदी लिखें-बोलें? हिंदी में ‘जागृति’ गृहीत है, ‘कृति’ आदि की लाइन पर। ‘जागर्ति’ यहाँ उसी तरह ग़लत है, जैसे ‘विस्तर से सिद्धांत प्रतिपादन’। यहाँ ‘विस्तार से’ सही है। उसी तरह ‘जागृति’ सही है। ‘जागर्ति’ यहाँ ग़लत है।”

यानी वाजपेयी जी का मत है कि संस्कृत में चाहे जो हो, हिंदी वालों ने अपने हिसाब से एकरूपता का ख़्याल करते हुए स्मृति, कृति की तर्ज़ पर जागृति को अपना लिया तो अपना लिया। संस्कृत में कोई चाहे जागर्ति बोलता रहे, हम हिंदी में जागृति बोलेंगे और इससे किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए!

मुझे नहीं मालूम, जागृत और जाग्रत के मामले में वाजपेयी जी का क्या मत था। अगर वे एकरूपता के तर्क से जागृति के पक्षधर हैं तो उसी नियम से मृत, कृत, वृत आदि की तर्ज़ पर जागृत भी हिंदी के लिए सही होना चाहिए।

चलिए, यह मैं आप पर छोड़ता हूँ। आप चाहें जाग्रत और जाग्रति चुनें या जागृत और जागृति चलाएँ। संस्कृत के कई शब्द हिंदी में अपने तत्सम और तद्भव दोनों रूपों में चलते हैं। इसी तरह ये भी चलें। दंपति और दंपती याद हैं न? संस्कृत में दंपती है और हिंदी में दंपति। दोनों के अपने-अपने तर्क हैं। क्या तर्क हैं, यदि जानने में रुचि हो तो यह क्लास पढ़ें जिसमें मैंने इन्हीं दो रूपों और उनके कारणों की चर्चा की थी। लिंक है –

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