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आलिम सर की हिंदी क्लास शब्द पहेली

80. उज्ज्वल, उज्जवल और उज्वल, सही क्या है और क्यों?

जब मैंने उज्वल, उज्ज्वल और उज्जवल पर पोल करने का फ़ैसला किया तो मुझे डर लगा कि कहीं सही विकल्प के पक्ष में 100% वोट न पड़ जाएँ। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। क़रीब 20% ने ग़लत विकल्प चुने जिनमें से 4% ने उज्वल और 16% ने उज्जवल को सही बताया। लेकिन जिन 80% ने उज्ज्वल को सही माना है, उनको भी यह जानने में रुचि हो सकती है कि उज्ज्वल क्यों सही है।

सही शब्द उज्ज्वल (उत्+ज्वल) है। इसी उज्ज्वल से उज्वल और उज्जवल जैसे वैकल्पिक शब्द निकले। एक वाक्य में कहें तो कुछ लोग बोलने के क्रम ने अगला ज् खा गए जिससे उज्वल बना तो कुछ और लोगों ने अगले ज् पर बल दे दिया जिससे उज्जवल बन गया।

ऐसा क्यों हुआ, यह मेरे मित्र और भाषाई चिंतक योगेंद्रनाथ मिश्र ने क्रमवार तरीक़े से इस तरह समझाया है :

  1. उज्वल, उज्ज्वल और उज्जवल – एक ही शब्द के तीन रूप हैं।
  2. मूल शब्द संस्कृत का उज्ज्वल है, जो उत् और ज्वल की संधि से बना है। उत् और ज्वल में संधि होने पर उत् का त् ज् में बदल गया। इस कारण उज्ज्वल शब्द में दो ज् (ज्ज्) हैं। एक जो उत् के त् में था और ज् में बदला और दूसरा जो ज्वल में पहले से ही था।
  3. हिन्दी में दो ज् वाला रूप ही मान्य है।
  4. चूँकि उज्ज्वल शब्द में तीन व्यंजन संयुक्त रूप में आए हैं (ज् ज् व), इसीलिए उनके उच्चारण में कठिनाई है। ऐसे में कुछ लोग उच्चारण की सरलता के लिए बोलते समय ज्ज को व से अलग कर देते हैं और ऐसा ही लिखने लगते हैं। यानी उज्जवल। परंतु ऐसा कोई शब्द है नहीं। इसलिए अमान्य है।
  5. उज्ज्वल का उज्वल रूप भी उच्चारण की सरलता का परिणाम है। जैसे – महत्त्व से महत्व।
  6. हिन्दी में महत्त्व (त्+त्) के साथ महत्व (त्) भी चल रहा है। महत्त्व के तद्भव रूप में।
  7. परंतु उज्ज्वल का उज्वल रूप प्रयोग में अभी स्वीकृत नहीं है। इसलिए वह भी अमान्य है।

योगेंद्रजी की व्याख्या पढ़ने के बाद यह तो आप जान ही गए होंगे कि सही शब्द उज्ज्वल है लेकिन यदि आप हिंदी शब्दसागर का ऑनलाइन संस्करण देखेंगे तो उसमें उज्ज्वल नहीं, उज्जवल मिलेगा (देखें चित्र)। ऑनलाइन कोश में उज्ज्वल भी है लेकिन उसका अर्थ कुछ और दिया गया है – प्रीति, अनुराग आदि।

यह साफ़-साफ़ कंपोज़िटर, प्रूफ़ रीडर और फ़ाइनल कॉपी अप्रूवर की लापरवाही है क्योंकि शब्दसागर के मूल प्रिंट संस्करण में उज्ज्वल ही है (देखें चित्र)।

जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूँ, हिंदी शब्दसागर एक प्रामाणिक कोश है, लेकिन शिकागो यूनिवर्सिटी की साइट पर डले उसके ऑनलाइन संस्करण पर आँख मूँदकर भरोसा न करें क्योंकि कंपोज़िंग के मामले में इसमें बहुत ही लापरवाही बरती गई है। सही की जगह यह आपको ग़लत ज्ञान भी दे सकता है।

अगर कभी आपको किसी शब्द के बारे में शंका हो तो शब्दसागर के प्रिंट संस्करण का सहारा लें। अगर वह उपलब्ध नहीं है तो उसके पुराने संस्करणों के पीडीएफ़ इंटरनेट से डाउनलोड करें। कभी ज़रूरत हो तो उन्हीं का सहारा लें। मैं वही करता हूँ।

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