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आलिम सर की हिंदी क्लास शब्द पहेली

73. मेरे दर्द की कुछ कर दवा, मरहम लगा, मलहम लगा

मरहम सही है या मलहम? इस सवाल पर फ़ेसबुक पर हुए एक पोल में मुक़ाबला बहुत क़रीबी रहा और मरहम के समर्थक 4% के अंतर से बाज़ी मार गए। लेकिन बहुमत का समर्थन होने से ही कोई विकल्प सही नहीं हो जाता। सवाल अब भी है कि क्या मरहम सही है और अगर हाँ तो क्या मलहम ग़लत है?

हिंदी शब्दसागर में मरहम और मलहम दोनों शब्द हैं (देखें चित्र) लेकिन दोनों में स्रोत के रूप में मरहम ही दिया हुआ है जिसको कोशकार ने अरबी मूल का बताया है। यानी मूल शब्द मरहम है, उसी से मलहम बना है। मलहम ही नहीं, मल्लम या मलम भी उसी मरहम के बदले हुए रूप हैं। मलहम का ही एक लिखित रूप मल्हम भी है।

चलिए, यह तो पता चल गया कि मूल शब्द मरहम है लेकिन यह शब्द बना कैसे, यह वही बता सकता है जिसे अरबी भाषा के धातुओं का पता हो। मेरे लिए तो अरबी-फ़ारसी काला अक्षर यानी भैंस बराबर हैं, इसलिए थोड़ा-बहुत सिर खपाने के बाद मैंने गूगल बाबा की शरण ली। मेरा अंदाज़ा था कि अजित वडनेरकर ने इस शब्द पर ज़रूर लिखा होगा इसलिए गूगल सर्च में ‘मरहम’ और ‘शब्दों का सफ़र’ टाइप किया। और लीजिए – पेज हाज़िर। अब नीचे मैं उन्हीं के पेज से लिया गया हिस्सा हलके-फुलके संपादन के साथ पेश कर रहा हूँ।

‘शरीर में चोट लग जाने पर ज़ख़्म पर दवा के रूप में जिस गाढ़े, चिकने अवलेह का लेपन किया जाता है, उसे मरहम कहते हैं। अरबी मूल का यह शब्द बरास्ता फ़ारसी हिंदी में दाख़िल हुआ है और यहाँ मरहम, मलहम, मल्हम और मल्लम जैसे रूपों में खूब इस्तेमाल होता है।

‘मरहम बना है म+रहम से। रहम भी हिंदी में ख़ूब इस्तेमाल होने वाला शब्द है। रहम मूलतः अरबी ज़बान का शब्द है और सिमिटिक धातु रह्म से बना है जिसमें दया का भाव है। रहम शब्द उर्दू, अरबी, फ़ारसी, हिंदी में ख़ूब प्रचलित है। सिमिटिक मूल का शब्द होने के नाते इसके रूपांतर हिब्रू भाषा में भी नज़र आते हैं। हिब्रू का रश्म या रशम (racham) शब्द भी इसी कड़ी में आता है जिसका मतलब भी करुणा, दया, प्रेम, ममता आदि है।

‘मरहम की व्याप्ति दुनिया की कई भाषाओं में अलग-अलग रूपों में है जैसे अल्बानी और तुर्की में यह मल्हम है तो फ़ारसी, हिंदी, उर्दू में मरहम; सीरियाई में इसका रूप मलेम होता है और बुल्गारी में मह्लम।’

यानी मरहम बना है रहम से

मरहम में मौजूद रहम मुझे शुरू से यह संकेत दे रहा था इसका रहम से कोई नाता है। लेकिन किसी घाव पर औषधियुक्त लेप लगाने में रहम यानी दया कहाँ से आ गई, समझ में नहीं आ रहा था। यह दया क्या मरहम करता है या मरहम लगाने वाला, यह भी पल्ले नहीं पड़ रहा था, इसलिए मैंने अपनी खोजबीन जारी रखी। मुझे लगा, दया के अलावा भी रहम के कुछ और अर्थ हो सकते हैं।

जब मैंने र-ह-म धातु के और अर्थ खोजे और विकिपीडिया के इसी से जुड़े पेज में मुझे उसका एक और अर्थ मिला – केयर करना यानी ख़्याल करना, देखभाल करना। मुझे लगता है, मरहम में मौजूद रहम का अर्थ दया के मुक़ाबले देखभाल करने से ज़्यादा जुड़ा हुआ है क्योंकि मरहम लगाने से घाव की केयर होती है, देखभाल होती है।

अब रहा सवाल कि मरहम से मलहम कैसे बना तो इसका ठीक-ठीक जवाब मेरे पास नहीं है। किशोरावस्था में मैं समझता था कि चूँकि लेप को मला जाता है, इसीलिए उसे मलहम कहते हैं (हालाँकि मरहम/मलहम को मला नहीं जाता, लगाया जाता है। मलने में दबाव का भाव है जबकि मरहम/मलहम बहुत नरमी से लगाया जाता है)। बाद में जब पता चला कि मूल शब्द मरहम है और उसी से मलहम बना है तो सोचा, शायद कुछ लोग र को ल बोलते हों जैसे कि मैं बचपन में रोटी को लोटी बोलता था।

मरहम का र ल में कैसे बदला, इसका जवाब भाषा वैज्ञानिक ही दे सकते हैं। मैं बस इतना जानता हूँ कि जीभ अगर तालु के बजाय दाँत के पास स्पर्श करे तो र की जगह ल की ध्वनि निकलती है। जैसा कि अजित वडनेरकर ने बताया, अल्बानी और तुर्की सहित और भाषाओं में भी मल्हम या वैसा ही कोई और रूप चलता है। प्लैट्स के अनुसार फ़ारसी में भी मरहम के साथ-साथ मलहम चलता था। इसलिए हम भारतीयों में से भी अगर आधे लोग मरहम को मलहम बोलें तो वे कोई भाषाई महापराध नहीं कर रहे। लेकिन मलहम बोलने वाले भी क्या मलहम-पट्टी बोलते हैं? पता नहीं। मैंने तो मरहम-पट्टी ही सुना है।

मरहूम : किसी को मारने में भी रहम?

मरहम से मिलता-जुलता एक और शब्द है मरहूम जिसका अर्थ है दिवंगत, स्वर्गीय आदि। कई लोगों की तरह कभी मैं भी मरहूम (दिवंगत) और महरूम (वंचित) में कन्फ़्यूज़िया जाता था। तब मैंने दोनों में अंतर याद रखने के लिए यह क्लू अपनाया था – जो मर गया, वह ‘मर’हूम।

लेकिन मरहम पर खोजबीन करते हुए पता चला कि मरहूम मरने से नहीं, रहम से बना है। म’रहूम’ यानी जिसपर रहम किया गया हो। अरबी में इस तर्ज़ पर कई शब्द बनते हैं। मसलन

  1. महफ़ूज़ – जिसकी हिफ़ाज़त की गई हो यानी सुरक्षित
  2. मक़बूल – जिसको क़बूल किया गया हो यानी स्वीकृत
  3. मक़तूल – जिसका क़त्ल किया गया हो यानी निहत
  4. महबूब – जिससे प्यार किया गया हो यानी प्रिय

इसी तरह मरहूम का मूल अर्थ है – वह, जिसपर रहम किया गया हो (देखें चित्र), लेकिन उसका प्रचलित अर्थ है – वह, जो इस दुनिया से उठ गया हो।

अब सवाल उठता है कि मरने वाले पर रहम किसने किया और किस तरह किया। चूँकि माना यही जाता है कि ‘ज़िंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ में है जहाँपनाह, जिसे न आप बदल सकते हैं, न मैं…’ इसलिए पहली नज़र में यही समझ में आता है कि मरहूम वह शख़्स है जिसे मौत की नींद सुलाकर ऊपरवाले ने उसपर रहम किया है। लेकिन यह समझना टेढ़ी खीर है कि मरने वाले को मारकर ऊपरवाले ने उसपर क्या रहम किया। क्या किसी का जीवन समाप्त करना कोई रहमत का काम है? अजित वडनेरकर यही मानते हैं। उनके अनुसार (वृद्धावस्था में बीमारी आदि के कारण) चूँकि जीवन दुखमय हो जाता है, इसलिए उस दुख से मुक्ति दिलाना रहम का ही कार्य (एक तरह की mercy killing?) माना जाता रहा होगा और इसीलिए मृतक के लिए मरहूम शब्द का इस्तेमाल किया गया।

इसके बारे में एक नज़रिया और है जो इस आधार पर बनता है कि इस शब्द का प्रयोग कहाँ और किसके लिए होता है। हर मरने वाले के लिए मरहूम शब्द नहीं चलता। सड़क हादसे में 10 लोग मरहूम हो गए, यह कोई नहीं बोलता-लिखता। मरहूम शब्द का प्रयोग किसी आदरणीय मृत व्यक्ति की चर्चा के दौरान ही होता है। निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति के बारे में यह धारणा रहती होगी कि ऊपरवाले ने उल भले और आदरणीय व्यक्ति को मौत के बाद जन्नत बख़्शी होगी और इस तरह उसने उसपर रहम किया है।

अब थोड़ी-सी बात महरूम की

मरहूम पर चर्चा के बाद अब महरूम पर भी कुछ बात कर ली जाए। जब मरहूम र-ह-म धातु से बना है तो महरूम ह-र-म धातु से बना होगा। सही पकड़े हैं। लेकिन हमने तो यही पढ़ा है कि हरम ज़नानख़ाने यानी अंतःपुर को कहते हैं जहाँ घर की स्त्रियाँ रहती हैं। अब इस ज़नानख़ाने का महरूम (वंचित) से क्या संबंध?

इसके लिए हमें ह-र-म धातु का मूल अर्थ जानना होगा। ह-र-म का मूल अर्थ है मनाही। चूँकि ज़नानख़ाने में सबके जाने की अनुमति नहीं होती है, इसीलिए उसे हरम कहा गया। पाक जगह को भी हरम कहते हैं, शायद इसलिए कि वहाँ भी प्रवेश से जुड़ी बंदिशें लागू होती हैं।

अब ह-र-म के इस मनाही वाले अर्थ से महरूम को जोड़ें तो यही अर्थ निकलता है कि जिनको कुछ सुविधाओं या चीज़ों की अनुमति नहीं है या जिन्हें उनसे बाहर रखा गया हो, वे महरूम हैं। लेकिन मैं अभी इस विश्लेषण से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूँ। इसपर सोच-विचार और विद्वानों से पूछताछ जारी है। आपमें से यदि कोई इस बारे में मेरा और बाक़ी साथियों का ज्ञानवर्धन कर सके तो स्वागत है।

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