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35. साम्राज्य विस्तार का यज्ञ – अश्वमेघ या अश्वमेध?

प्राचीन ग्रंथों में एक महायज्ञ का उल्लेख है जिसमें घोड़े की प्रधान भूमिका रहती थी। इसीलिए इस यज्ञ के नाम के शुरू में ‘अश्व’ है जिसका अर्थ है घोड़ा। लेकिन अश्व के बाद क्या है, इसपर लोगों में भ्रम है। कुछ लोग इसे अश्वमेध (ध) लिखते हैं, कुछ लोग अश्वमेघ (घ)। सही क्या है, यह जानने के लिए आगे पढ़ें।

जब हमने इस शब्द पर फ़ेसबुक पर पोल किया था तो 58% ने कहा – अश्वमेध। 42% ने कहा – अश्वमेघ। सही शब्द है अश्वमेध।

यदि दस में से चार लोग अश्वमेध को अश्वमेघ समझ रहे हैं तो ज़रूर इसके पीछे कोई बड़ा कारण होगा। मेरे हिसाब से इसके दो कारण हैं। एक तो यह है कि ‘ध’ और ‘घ’ देखने में मिलते-जुलते-से हैं और कई बार ‘ध’ को ग़लती से ‘घ’ पढ़ लिया जाता है। दूसरे, ‘मेध’ शब्द अनोखा-अपरिचित है जबकि ‘मेघ’ शब्द बोलचाल में ज़्यादा इस्तेमाल न होने के बावजूद नामों और फ़िल्मी गानों में ख़ूब चलता है। आप अपनी परिचिताओं के नामों को याद करें, एक-दो का नाम मेघा अवश्य होगा। इसी तरह ‘मेघा रे, मेघा रे’, ‘मेघा छाए आधी रात’ या ‘बरसो रे मेघा-मेघा’… जैसे गाने हमने सुन रखे होते हैं।

अब हम जानें कि अश्वमेध में ‘मेध’ का अर्थ क्या है। मेध शब्द मेधः का ही एक रूप है जिसका अर्थ है बलि (देखें आप्टे के संस्कृत-अंग्रेज़ी शब्दकोश का संबंधित पृष्ठचित्र)। अश्व के साथ मिलकर शब्द बना अश्वमेध यानी घोड़े की बलि।

नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हिंदी शब्दसागर में इसका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार दिया गया है – इसमें घोड़े के मस्तक पर जयपत्र बाँधकर उसे भूमंडल में घूमने के लिए छोड़ देते थे। उसकी रक्षा के निमित्त किसी वीर पुरुष को नियुक्त कर देते थे जो सेना लेकर उसके पीछे-पीछे चलता था। जिस किसी राजा को अश्वमेध करने वाले का आधिपत्य स्वीकृत नहीं होता था, वह उस घोड़े को बाँध लेता और सेना से युद्ध करता था। अश्व बाँधने वाले को पराजित कर तथा घोड़े को छुड़ाकर सेना आगे बढ़ती थी। इस प्रकार वह घोड़ा संपूर्ण भूमंडल में घूमकर लौटता था, तब उसको मारकर उसकी चर्बी से हवन किया जाता था। यह यज्ञ केवल बड़े प्रतापी राजा करते थे। यह यज्ञ साल भर में होता था (देखें चित्र)।

वाल्मीकि रामायण में राम के अश्वमेध यज्ञ की विधि के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं लिखा गया है लेकिन दशरथ ने जो अश्वमेध यज्ञ किया था, उसका बालकांड में विस्तृत और दिलचस्प वर्णन है। इससे पता चलता है कि बलि देने का काम रानी करती थी और वह बलि के बाद घोड़े के साथ एक रात भी गुज़ारती थी। जिनकी इस यज्ञविधि को जानने में रुचि हो, वे इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं।

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