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आलिम सर की हिंदी क्लास शुद्ध-अशुद्ध

156. चिड़िया क्या बनाती है – ‘घोसला’ या ‘घोंसला’?

घोसला सही है या घोंसला? इसी तरह यह भी पूछा जा सकता है कि फेकना सही है या फेंकना, पोछना सही है या पोंछना, ठोकना सही है या ठोंकना। हिंदी में ऐसे बहुत सारे शब्द हैं जिनमें शुरुआती स्वरों – ख़ासकर जिनका आरंभ ‘ए’ और ‘ओ’ स्वरों से होता है – वहाँ यह संदेह बना रहता है कि इनको अनुनासिकता (नाक) के साथ बोला जाना चाहिए या बिना अनुनासिकता के। क्या आपको भी संदेह है कि घोसला सही है या घोंसला? अगर है तो जवाब पाने के लिए नीचे पढ़ें।

बाक़ी शब्दों की तरह ‘घोसला’ और ‘घोंसला’ पर भी हिंदी जगत में कितना भ्रम है, इसकी पुष्टि उस फ़ेसबुक पोल से हुई जो हमने घोंसला और घोंसला पर किया था। इसमें एक-चौथाई का मानना था कि घोसला सही है जबकि तीन-चौथाई घोंसला के पक्ष में थे।

शब्दकोशों के अनुसार सही है घोंसला। क्यों सही है, इसका कोई तर्क नहीं दिया गया है। शब्दसागर के अनुसार या तो यह देशज शब्द है या फिर संस्कृत के कुशालय से बना है (देखें चित्र)।

हिंदी शब्दसागर में घोंसला।

अगर यह देशज शब्द है, तब तो इसकी व्युत्पत्ति को लेकर कोई चर्चा नहीं हो सकती। लेकिन यदि कुशालय से बना है तो यह प्रश्न उठ सकता है कि संस्कृत शब्द (कुशालय) में तो कोई नासिक्य ध्वनि (ङ्, ञ्, ण्, न् या म्) नहीं है, फिर हिंदी शब्द (घोंसला) में अनुनासिक (ओँ की) ध्वनि कैसे आ गई।

यह प्रश्न घोंसला ही नहीं, हिंदी के ऐसे बहुत सारे शब्दों के बारे में पूछा जा सकता है जिनके आरंभ में अनुनासिक स्वर है। विद्वानों की मानें तो यह हिंदी की अपनी प्रवृत्ति है जो संस्कृत से आए शब्दों में बहुधा देखी जा सकती है। जैसे दंत का दाँत हुआ, अक्षि से आँख हुआ, पंक्ति से पाँत हुआ, सत्य से साँच हुआ। दंत से दाँत और पंक्ति का पाँत तो समझ में आता है कि मूल शब्द में मौजूद नासिक्य ध्वनियाँ (न् और ङ्) अनुनासिक ध्वनि में बदल गई मगर अक्षि (अक्खि>अँक्ख) और सत्य (सत्त>सच्च) में तो कोई नासिक्य ध्वनि नहीं है। वहाँ यह बदलाव क्यों?

इसी तरह शिङ्घति से सूँघना या कुम्हड़ा से कोंहड़ा बनना समझ में आता है (ङ् और म् का अनुनासिक ध्वनि में परिवर्तन) मगर भौ-भौ से भौंकना क्यों हुआ, यह समझ में नहीं आता। भौ-भौ में भला कौनसी नासिक्य ध्वनि है? इसी तरह प्रोच्छन से पोंछना क्यों हुआ, पोछना क्यों नहीं, यह भी गले नहीं उतरता।

ऐसा भी नहीं है कि हर जगह यह परिवर्तन होता है (होता तो हमें सुविधा ही होती)। सोचना, खोजना, देखना, छोड़ना, जोड़ना, टोकना, तौलना, देखना, बोलना आदि में ऐसा कोई बदलाव नहीं दिखाई देता।

पिछले कुछ महीनों से मैं इसके बारे में सोच रहा हूँ और प्रयास कर रहा हूँ यह पता लगाने का कि क्या इसके पीछे कोई नियम है कि किन व्यंजन ध्वनियों में शुरुआती स्वर अनुनासिक हो जाता है और किनमें नहीं। पहले लगा, शायद महाप्राण ध्वनियों (जिनमें हकार होता है) में ऐसा होता है (छौंकना, झोंकना, ठोंकना, भौंकना) लेकिन फिर चौंकना और पोंछना याद आए तो इस सिद्धांत को तिलांजलि देनी पड़ी। वैसे अब भी लगता है कि अल्पप्राण ध्वनियों के मुक़ाबले महाप्राण ध्वनियों में यह प्रवृत्ति ज़्यादा है। मगर ऐसी कोई भी राय बनाने से पहले ऐसे तमाम शब्दों की सूची बनानी होगी। यह काम अभी बाक़ी है।

आपमें से से यदि किसी साथी ने इस प्रवृत्ति के बारे में कहीं पढ़ा हो या अपनी कोई राय हो तो कृपया नीचे साझा करें। रुकिए, साझा या साँझा? चलिए, अभी इस बहस में नहीं पड़ते। हाँ, अगर आपको इससे पहले हुई चर्चाओं – ‘नींबू’ या ‘नीबू’, ‘होंठ’ या ‘होठ’ – में रुचि हो तो नीचे दिए गए लिंक पर जा सकते हैं।

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