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208. हारने वाला जीतता है तो पासा पलटता है या पाँसा?

लूडो या साँप-सीढ़ी के खेल में हम जो छह-मुखी चीज़ उछालते हैं, उसे अंग्रेज़ी में dice कहा जाता है। लेकिन हिंदी में उसे क्या कहा जाता है? पासा या पाँसा? और फिर उससे जो मुहावरा बना है, वह पासा पलटना है या पाँसा पलटना? आज की चर्चा इसी पर। रुचि हो तो पढ़ें।

आज की चर्चा शुरू करते हुए सबसे पहले हम यह पता लगाएँगे कि पासा सही है या पाँसा। इसके लिए हमें इस शब्द के स्रोत तक जाना होगा। हिंदी शब्दसागर के अनुसार यह शब्द संस्कृत के पाशक शब्द से आया है (देखें चित्र)।

आपने देखा कि शब्दसागर में पासा शब्द दिया हुआ है जो संस्कृत के पाशक से बना है। यह पाशक प्राकृत में पासा हुआ और वहीं से हिंदी में आया है।

तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि पासा ही सही है और पाँसा ग़लत है?

जी नहीं। कारण यह कि हिंदी शब्दसागर में ही पाँसा भी है

यानी शब्दसागर के अनुसार दोनों सही है।

आपमें से कोई पूछ सकता है कि आख़िर शब्दकोश दोनों को सही कैसे बताते हैं। सही तो किसी एक को ही होना चाहिए जो पहले बना हो और इसका फ़ैसला उस मूल शब्द के आधार पर किया जा सकता है जिससे वह बना हो।

शब्दसागर के अनुसार पासा/पाँसा संस्कृत के पाशक से बना है। पाशक से प्राकृत में बना पासा और वहीं से वह हिंदी में आया। यानी हिंदी में आया मूल शब्द तो पासा ही है। तो फिर यह पाँसा कैसे बना?

यह एक अहम सवाल है और इसका आंशिक जवाब हमें उस ट्रेंड में मिलता है जो हम संस्कृत से हिंदी में आए शब्दों में देखते हैं। ट्रेंड यह है कि संस्कृत के जिन शब्दों में नासिक्य ध्वनि होती है (यानी ङ्, ञ्, ण्, न् और म्), वे जब हिंदी में आए तो उस नासिक्य ध्वनि के बदले शब्द का आरंभिक स्वर अनुनासिक हो गया यानी उसमें चंद्रबिंदु लग गया। उदाहरण कई हैं – दन्त से दाँत, पङ्क्ति से पाँत, ग्राम से गाँव, भ्रमर से भँवरा आदि। लेकिन यहाँ एक अजीब बात यह दिखती है कि जिन शब्दों में कोई नासिक्य ध्वनि नहीं थी, उनमें भी यह प्रवृत्ति पाई जाती है। मसलन अक्षि से आँख, सर्प से साँप, सत्य से साँच।

कहने का अर्थ यह कि शब्दों के आरंभिक स्वर को अनुनासिक बनाने की प्रवृत्ति हिंदी में है (भले ही मूल शब्द में नासिक्य ध्वनि रही हो या न रही हो) और इसी के तहत पासा किसी दौर में या किसी ख़ास इलाक़े में पाँसा बोला जाने लगा।

अब बात करते हैं ‘पासा/पाँसा पलटने’ के बारे में। यदि लॉजिक से बात करें तो ‘पासा पलटना’ भी सही होना चाहिए और ‘पाँसा पलटना’ भी क्योंकि हिंदी शब्दसागर पासा और पाँसा दोनों को सही बताता है। यही नहीं, इन दोनों शब्दों की एंट्रीज़ को देखें कि एक में ‘पासा पलटना’ लिखा है, दूसरी में ‘पाँसा उलटना’। हम जानते हैं कि उलटना और पलटना का एक ही अर्थ है हालाँकि मुहावरे के तौर पर पलटना ही अधिक प्रचलित है।

लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं है। यह मेरी समझ है (जो ग़लत भी हो सकती है) कि संज्ञा के तौर पर पाँसा और पासा में लोग पाँसा का ही ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं। मतलब जब पाँसे/पासे की बात होगी तो पाँसे फेंको ही कहा जाएगा, पासे फेंको नहीं। लेकिन जब उसका मुहावरे के तौर पर ‘किसी संभावना के एकाएक बदल जाने’ के अर्थ में इस्तेमाल होगा तो पता नहीं क्यों, पासा पलटना ही अधिक प्रचलित है। अगर कोई पासा के बजाय पाँसा का प्रयोग करे और कहे – पाँसा पलट गया – तो यूँ लगता है कि वह मुहावरे की बात नहीं, बल्कि खेल में इस्तेमाल होने वाले पाँसे की बात कर रहा है जो बिसात से लगकर पलट गया हो।

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