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भगवद् गीता या भागवत गीता या दोनों सही या दोनों ग़लत?

गीता के बारे में सब जानते हैं लेकिन इसका पूरा नाम क्या है और उसे कैसे लिखा और बोला जाता है, इसपर काफ़ी भ्रम है। हिंदी मीडिया में इसे पाँच-छह तरह से लिखा जाता है। इस शब्दचर्चा में यही बताया गया है कि इसका सही रूप क्या है। रुचि हो तो पढ़ें।

अगर आपको अमिताभ बच्चन के ‘कौन बनेगा करोड़पति?’ में जाने का मौक़ा मिले और आपसे पूछा जाए कि गीता का पूरा नाम क्या है तो आप नीचे दिए गए इन चार विकल्पों में से कौनसा विकल्प चुनेंगे?

  • A. भगवत गीता (शुरू में , अंत में ) जैसा कि आजतक और News18 में लिखा जा रहा है।
  • B. भगवद गीता (शुरू में , अंत में ) जैसा कि जनसत्ता, इंडिया टीवी और Zee News लिख रहे हैं।
  • C. भागवत गीता (शूरू में भा, अंत में ) जैसा कि अमर उजाला, ABP News और नवभारत टाइम्स में देखा गया।
  • D. भागवद गीता (शुरू में भा, अंत में ) जैसा कि दैनिक भास्कर लिखता है।

आप इनमें से कोई भी विकल्प चुनें – A, B, C या D – आपको निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकि अमिताभ बच्चन हर हाल में आपसे कहेंगे, ‘अफ़सोस, ग़लत जवाब!’ कारण, ये सारे- के-सारे विकल्प ग़लत हैं। आपको कहना चाहिए था – इनमें से कोई नहीं।

हिंदी वेबसाइटों में भगवत, भगवद, भागवत और भागवत गीता।

सही है – भगवद्गीता। भगवत्+गीता=भगवद्गीता। सामासिक अर्थ – भगवान् द्वारा गाई गई या कही गई।

जागरण, NDTV, जनसत्ता और भास्कर की कई ख़बरों में मुझे यह रूप मिला। लेकिन यहाँ भी NDTV और जनसत्ता ने गड़बड़ी कर दी – भगवद् और गीता को अलग-अलग (भगवद् गीता) लिख दिया जबकि लिखा जाना चाहिए एकसाथ – भगवद्गीता।

भगवद्गीता को भगवद् गीता इसलिए नहीं लिखा जा सकता कि भगवद्गीता भगवत् और गीता के मेल से बना है। उसी तरह जैसे हिमालय हिम और आलय के मेल से और रामायण राम और अयन के मेल से बना है। क्या आप हिमालय को अलग-अलग हिमा लय लिख सकते हैं या रामायण को रामा यण लिख सकते हैं? नहीं। उसी तरह भगवद्गीता को भी भगवद् गीता (या भगवद गीता) नहीं लिखा जा सकता।

भगवद्गीता को श्रीमद्भगवद्गीता भी कहते हैं। श्रीमत् + भगवत् + गीता = श्रीमद्भगवद्गीता। संधि होने के कारण श्रीमत् और भगवत् का ‘त्’ ‘द्’ में बदल गया।

आपको मालूम होगा कि व्यंजन संधि के एक नियम के अनुसार जब ‘त्’ के बाद ‘भ्’ या ‘ग्’ आता है तो ‘त्’ बदल जाता है ‘द्’ में। इसीलिए जब श्रीमत् के ‘त्’ की भगवत् के ‘भ्’ से संधि हुई तो श्रीमत् हो गया श्रीमद् (त् का द् हो गया)। इसी तरह भगवत् के ‘त्’ की गीता के ‘ग्’ से संधि हुई तो भगवत् का भगवद् हो गया (यहाँ भी त् का द् हो गया)। यही वजह है कि श्रीमत् भगवत् गीता संधि (मिलने) के बाद हो जाता है श्रीमद्भगवद्गीता।

यानी आप श्रीमत् भगवत् गीता (अलग-अलग) भी लिख सकते हैं और श्रीमद्भगवद्गीता (मिलाकर) भी। तीनों शब्दों को अलग-अलग लिखेंगे तो ‘श्रीमत्’ और ‘भगवत्’ तथा मिलाकर लिखेंगे तो ‘श्रीमद्’ और ‘भगवद्’। परंतु शब्दों को अलग-अलग लिखते समय श्रीमद्/श्रीमद या भगवद्/भगवद लिखेंगे तो यह सही नहीं होगा।

भागवत गीता और भागवद गीता लिखना तो और भी ग़लत है।

संस्कृत के विद्वान कुशाग्र अनिकेत बताते हैं कि यदि भगवद्गीता को भागवत गीता लिखा जाए तो उसका अर्थ हो जाएगा भगवान् से संबद्ध गीता। किंतु भगवद्गीता का अपेक्षित अर्थ है ‘भगवान् के द्वारा उक्त’। इसलिए भागवत गीता लिखना ग़लत है।

भागवत गीता लिखना क्यों ग़लत है – कुशाग्र अनिकेत की राय।

भागवत से याद आया, अकसर लोग श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत पुराण (श्रीमद्भागवतम्) में कन्फ़्यूज़ कर जाते हैं। ये दोनों अलग-अलग ग्रंथ हैं। श्रीमद्भगवद्गीता (जिसे बोलचाल में गीता भी कहते हैं) महाभारत का एक अंश है जिसमें कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्धभूमि में दिया गया ज्ञान है। उधर श्रीमद्भागवतम् (जिसे बोलचाल में भागवत भी कहते हैं) एक वैष्णव ग्रंथ है जिसमें विष्णु के नाना अवतारों और उनसे जुड़ी कथाओं का उल्लेख है। इसमें विष्णु के कृष्ण रूप पर ज़ोर है जिन्हें इस ग्रंथ में अवतार नहीं, स्वयं भगवान-स्वरूप माना गया है।

एक वाक्य में कहें तो जब हम गीता/भगवद्गीता/श्रीमद्भगवद्गीता कहते हैं तो हमारा आशय उस ग्रंथ से होता है जिसमें महाभारत के युद्ध में कृष्ण की अर्जुन को दी गई शिक्षा का वर्णन है और जब हम भागवत/श्रीमद्भागवतम्/श्रीमद्भागवत पुराण कहते हैं तो हमारा आशय उस वैष्णव ग्रंथ से होता है जिसमें विष्णु और उनके अवतारों के बारे में लिखा गया है।

मुझे न तो संस्कृत का ज्ञान है, न ही धर्मग्रंथों के विषय में अधिक जानकारी है। इसलिए इस लेख की तैयारी में डॉ. सुरेश पंत, कुशाग्र अनिकेत और कमलेश त्रिपाठी जैसे विद्वानों और सुबोध दुबे और सचिन तिवारी जैसे जानकारों से सहयोग लिया। इस टिप्पणी का सारा श्रेय उन्हीं को जाता है।

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