अम्मा और अम्माँ – इन दोनों के उच्चारण में कोई अंतर नहीं है। उसी तरह जिस तरह माँ और मा के उच्चारण में कोई अंतर नहीं है। लेकिन हिंदी में ‘माँ’ ही चलता है भले संस्कृत में ‘मा’ हो। ऐसे में प्रश्न उठता है कि अम्मा/अम्माँ के बीच कौनसा सही है – हिंदी के लिहाज़ से? आज की चर्चा इसी पर है। रुचि हो तो पढ़ें।
अम्मा और अम्माँ के बीच जब एक फ़ेसबुक पोल किया गया तो कोई 80% लोगों ने अम्मा के पक्ष में वोट दिया, 15% लोगों ने अम्माँ को सही बताया और शेष 5% के मुताबिक़ दोनों सही हैं।
साढ़े पाँच साल पहले (दिसंबर, 2019 में) किसी और मंच पर यह पोल किया था, तब भी 80% लोगों ने अम्मा को सही बताया था।
मैं भी किशोरावस्था से अम्मा को ही सही मानता आया हूँ लेकिन…
चौंकिए नहीं, अम्मा ग़लत नहीं है लेकिन अम्माँ भी सही है। क्यों, यह नीचे बताऊँगा लेकिन पहले यह जान लें कि मैं भी 80% लोगों की तरह अम्मा को क्यों सही मानता था। मुझे लगता था कि अम्मा अरबी-फ़ारसी का शब्द है और वहीं से आया है हालाँकि कई हिंदू घरों में मैंने माँ के लिए अम्मा शब्द सुना था। परंतु हिंदी-उर्दू सीरियलों और कहानियों में मुस्लिम पात्रों के संवादों में अम्मी-अब्बू पढ़-सुनकर यही आभास था कि मूल रूप से यह अरबी-फ़ारसी परिवार का शब्द है।
मुझे यह भी पता था कि उर्दू के शब्दों के अंत में अगर ‘मा’ हो तो उसके ऊपर चंद्रबिंदु ‘न’ के विकल्प के तौर पर ही आता है वरना नहीं। मसलन आसमाँ और मेहमाँ में ‘माँ’ है मगर वह आसमान और मेहमान से ‘न’ हटने के कारण आता है। कहने का मतलब यह कि अगर अम्मान जैसा कोई शब्द होता तो वह अम्माँ लिखा जा सकता था।
लेकिन माँ के अर्थ में अम्मान कभी सुना नहीं था, सो लगता यही था कि ‘अम्मा’ उर्दू का शब्द है जो अरबी या फ़ारसी से आया होगा और धीरे-धीरे हिंदी में भी चल गया होगा।
परंतु इस बात की पुष्टि करने के लिए जब मैंने हिंदी शब्दसागर में ‘अम्मा’ शब्द खोजा तो मुझे नहीं मिला। मगर ‘अम्माँ’ खोजा तो वह मिल गया। हैरत की बात यह भी थी कि हिंदी शब्दसागर में इसे अरबी-फ़ारसी का नहीं बल्कि तद्भव शब्द बताया गया था – तत्सम अंबा का तद्भव अम्माँ (देखें चित्र)। प्लैट्स के शब्दकोश में भी यही लिखा गया है (देखें चित्र)।


मुझे भरोसा नहीं हो रहा था। सोचा, हो सकता है, अम्मा शब्द दोनों भाषाओं में चलता हो जैसे माँ हिंदी में भी है, फ़ारसी में भी। लेकिन किसी भी उर्दू शब्दकोश में मुझे माँ के अर्थ में अम्मा नहीं मिला। अगर मिला भी तो अरबी शब्द अम्मः जिसका अर्थ था – बुआ (देखें चित्र)।

रिश्तों के लिए दो और शब्द मिले। एक अम और दूसरा उम। अम (या अम्म) का अर्थ था चाचा और उम (या उम्म) का मतलब था माँ (देखें चित्र)। एक शब्दकोश में उम्मः भी दिया हुआ था। यानी अम्मा से मिलता-जुलता शब्द उम्म या उम्मः तो अरबी में है लेकिन माँ के अर्थ में अम्मा कहीं नहीं है।

मेरे लिए यह कहना मुश्किल है कि माँ के अर्थ वाला अरबी शब्द उम्म/उम्मः भारत आकर अम्मा हुआ या फूफी के अर्थ वाले अरबी शब्द अम्मः का मतलब यहाँ माँ हो गया। इसलिए कोशकारों की बात मानकर यही स्वीकार कर लिया कि हिंदी में प्रचलित अम्मा/अम्माँ संस्कृत के अंबा से बना है जो प्राकृत के माध्यम से हिंदी में आया।
प्राकृत की यह प्रवृत्ति रही है कि वह संयुक्त ध्वनि वाले शब्दों में किसी एक ध्वनि का द्वित्व (डबल) कर देता है। जैसे धर्म का धम्म, सत्य का सत्त और सच्च। उसी तरह अम्बा में भी ‘ब’ हटा गया और म् का द्वित्व हो गया। बन गया अम्मा।
ध्यान दीजिए। प्राकृत में भी अम्मा बना, अम्माँ नहीं।
तो फिर यह अम्माँ कहाँ से आया?
मुझे लगता है, चूँकि हिंदी के माँ में चंद्रबिंदु है, इसलिए शुरुआती लेखक अम्मा को भी अम्माँ ही लिखते रहे होंगे और कोशकारों ने उसी को स्थान और मान दिया। उर्दू लेखकों के बारे में मैं नहीं जानता कि वे अम्मा लिखते हैं या अम्माँ। संभावना तो यही है कि वे चंद्रबिंदु नहीं लगाते होंगे।
ऐसा नहीं कि हिंदी के शब्दकोशों में अम्मा नहीं है। राजपाल के शब्दकोश में अम्मा को ही प्रधानता दी गई है (देखें चित्र)। शब्दसागर में भी हालाँकि अम्मा की अलग से एंट्री नहीं है, लेकिन दूसरे शब्दार्थों के साथ जहाँ इस शब्द का ज़िक्र आया है, वहाँ अम्मा ही है, अम्माँ नहीं। प्लैट्स के कोश में भी अम्मा है।

निष्कर्ष यह कि व्युत्पत्ति और प्रचलन, दोनों के आधारों पर अम्मा ही सही स्पेलिंग लगती है लेकिन चूँकि हिंदी के प्रामाणिक शब्दकोशों में अम्माँ भी है, इसलिए दोनों को सही घोषित करना होगा।
