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पद्मश्री बशीर बद्र लिखना ग़लत है, मगर क्यों?

मशहूर शायर बशीर बद्र के निधन की ख़बर लिखते हुए कई हिंदी वेबसाइटों ने उनके नाम के आगे पद्मश्री लगाया क्योंकि वह पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हो चुके थे (देखें चित्र)। लेकिन बशीर बद्र के नाम के आगे पद्मश्री लगाना ग़लत है, असंवैधानिक है। क्यों ग़लत है, यह जानने के लिए आगे पढ़ें।

मशहूर शायर बशीर बद्र के निधन की ख़बर लिखते हुए कई वेबसाइटों ने उनके नाम के आगे पद्मश्री लगाया क्योंकि वह पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हो चुके थे। मसलन पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का निधन (भास्कर), मशहूर शायर और पद्मश्री बशीर बद्र का निधन (एबीपी न्यूज़), पद्मश्री बशीर बद्र के निधन से पैतृक गाँव में पसरा सन्नाटा (जागरण), नहीं रहे पद्मश्री बशीर बद्र (अमर उजाला), मिट्टी से जुड़े थे पद्मश्री शायर बशीर बद्र (हिंदुस्तान)।

ये सारे बड़े संस्थान हैं और उनके पत्रकारों द्वारा दिए गए ऐसे शीर्षक बताते हैं कि इन संस्थानों के पत्रकारों में ज़रूरी क़ानूनी जानकारियों का कितना अभाव है। साथ ही यह भी पता चलता कि ये संस्थान अपने पत्रकारों की ट्रेनिंग को लेकर कितने लापरवाह हैं। अगर यह ट्रेनिंग दी गई होती तो वे बशीर बद्र साहब के नाम के आगे पद्मश्री कभी नहीं लगाते।

इसलिए नहीं लगाते कि किसी भी व्यक्ति के नाम के आगे पद्म पुरस्कार का उल्लेख ‘ग़ैरक़ानूनी और असंवैधानिक’ है और इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट और हाइ कोर्ट के निर्णय भी आ चुके हैं। अंतिम निर्णय तो दिसंबर 2025 का ही है।

इन शीर्ष अदालतों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पद्म पुरस्कार (जैसे पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण) या भारत रत्न कोई उपाधियाँ नहीं हैं, इसलिए इन्हें नाम के आगे या पीछे नहीं लिखा जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय की पाँच जजों की एक बेंच ने ‘बालाजी राघवन बनाम भारत संघ’ (1995) मामले में निर्णय देते हुए कहा था कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 18(1) देश में किसी भी तरह की ‘उपाधियों के अंत’ की बात करता है ताकि समाज में समानता बनी रहे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये राष्ट्रीय पुरस्कार केवल ‘नागरिक सम्मान’ हैं, न कि कोई आधिकारिक या वंशानुगत उपाधियाँ। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि कोई व्यक्ति इन पुरस्कारों को अपने नाम के आगे या पीछे लगाता है तो नियमों के तहत उससे उसका यह राष्ट्रीय सम्मान वापस लिया जा सकता है।

अब आप पूछ सकते हैं कि बशीर बद्र ख़ुद तो अपने नाम के आगे पद्मश्री लगा नहीं रहे। अगर कोई अन्य व्यक्ति (जैसे मीडिया) ऐसा करता है तो क्या वह भी दोषी माना जाएगा।

इसका जवाब दिसंबर 2025 के बॉम्बे हाई कोर्ट के जज जस्टिस सोमशेखर सुंदरेशन की टिप्पणी में निहित है। जस्टिस सुंदरेशन ने याचिका पर सुनवाई करते हुए देखा कि इसमें प्रतिवादियों की सूची में दर्ज एक व्यक्ति का नाम पद्मश्री डॉ. शरद एम. हर्डीकर’ लिखा था तो उन्होंने इस नियम को दोबारा कड़ाई से दोहराया और नाम से पद्मश्री हटाने का निर्देश दिया।

यानी न वह व्यक्ति ख़ुद अपने नाम के आगे या पीछे पद्म पुरस्कार का उल्लेख कर सकता है, न कोई और।

अब बस अंतिम सवाल यह बचता है कि यदि किसी को बताना हो कि अमुक व्यक्ति को पद्म पुरस्कार मिल चुका है तो यह कैसे किया जाए। इसका तरीक़ा यह है कि पुरस्कार का उल्लेख विजेता के नाम के आगे या पीछे न करके ‘पद्म पुरस्कार प्राप्त’ लिखा जाए। जैसे बशीर बद्र के मामले में लिखा जा सकता था – पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त डॉ. बशीर बद्र।

अगर किसी को ऐसा लगता है कि इतना सब लिखने पर शीर्षक लंबा हो जाएगा तो शीर्षक में पद्मश्री लिखने की ज़रूरत ही क्या है? क्या बशीर बद्र इसलिए बड़े शायर हैं कि उनको पद्मश्री मिला या पद्मश्री उनको इसलिए मिला कि वह बड़े शायर थे? बशीर बद्र जैसों का परिचय देते हुए हम किसी पुरस्कार का उल्लेख करें या न करें, उनके स्टेटस पर कोई अंतर नहीं पड़ता।

कोई भी लेखक-कलाकार अपनी रचनाओं से बड़ा होता है, किसी सत्ता या संस्थान द्वारा दिए गए पुरस्कारों से नहीं।

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