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हिंदी क्लास

क्लास 2 – ‘कसमें’ में बिंदी तो ‘मुक़दमें’ में क्यों नहीं?

यह क्लास आपको बताएगी कि एकारांत यानी ‘ए’ से अंत होनेवाले शब्दों में कब बिंदी का प्रयोग होता है और कब नहीं। जैसे मुक़दमा का जब बहुवचन बनाते हैं तो वह मुक़दमे ही रहता है) लेकिन क़सम का बहुवचन बनाने पर क़समें हो जाता है। जानिए, इसका आसान-सा नियम।

पिछली क्लास (‘झंडे का झंडे होता है, नेता का नेते क्यों नहीं?) में हमने पढ़ा था कि आकारांत यानी ‘आ’ से अंत होने वाले संज्ञा शब्दों पर कारक चिह्नों का क्या असर होता है। हमने जाना था कि ऐसे पुल्लिंग शब्दों में ‘आ’ का ‘ए’ हो जाता है मगर स्त्रीलिंग शब्दों में कोई अंतर नहीं आता। जैसे घड़ा का घड़े हो जाता है (‘मैंने घड़े का पानी पीया’ न कि ‘मैंने घड़ा का पानी पीया’) क्योंकि घड़ा पुल्लिंग है लेकिन सत्ता का सत्ते नहीं होगा (‘सभी दल सत्ता के पीछे पड़े हैं’ होगा न कि ‘सभी दल सत्ते के पीछे पड़े हैं’) क्योंकि सत्ता स्त्रीलिंग है। यानी कारक चिह्नों से पहले आने वाले आकारांत स्त्रीलिंग शब्दों में कोई बदलाव नहीं होगा, पुल्लिंग में होगा। (तत्सम आकारांत शब्दों में यह नियम लागू नहीं होता यानी वहाँ आ का ए नहीं होता चाहे शब्द स्त्रीलिंग हो या पुल्लिंग)।

नवभारतटाइम्स.कॉम में मुकदमें का प्रयोग।

लेकिन ‘आ’ का ‘ए’ करते समय एक नई समस्या आती है। क्या इस ए के साथ कोई बिंदी भी लगेगी? जैसे मुक़दमा का मुक़दमे होगा या मुक़दमें? आप ऊपर की तस्वीर देखें। यह एक जानी-मानी वेबसाइट का स्क्रीनशॉट है जिसके कॉपी एडिटर ने ख़बर का संपादन करते समय शीर्षक और स्टोरी (अंग्रेज़ी में सही उच्चारण स्टॉरी) में ‘मुकदमें’ कर दिया है या रहने दिया है (क में नुक़्ते की तो बात ही भूल जाएँ)। हो सकता है, रिपोर्टर ने मुकदमे लिखा हो और कॉपी एडिटर ने उसे अपने हिसाब से सही कर दिया हो या फिर रिपोर्टर ने ही मुकदमें लिखा हो और कॉपी एडिटर ने उसे सही समझते हुए ठीक न किया हो। कहने का अर्थ यह कि इस शब्द को लेकर बड़ी-बड़ी वेबसाइटों में काम करनेवालों के मन में भी भ्रम है।

रिपोर्टर या कॉपी एडिटर या दोनों ने ऐसा क्यों किया होगा, इसके दो कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि ‘म’ और ‘न’ नाक से बोले जाते हैं (बोलकर देखिए) इसलिए इनमें जब अलग से बिंदु या चंद्रबिंदु लगाया जाता है तो कई लोग दोनों ध्वनियों में अंतर नहीं कर पाते। जैसे मा और माँ में क्या अंतर है या मे और में के बीच क्या फ़र्क़ है, यह समझ पाना कई लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। बांग्ला में तो माँ को मा(মা) ही लिखा जाता है। इस रिपोर्टर और/या कॉपी एडिटर के साथ भी ऐसी ही समस्या दिखती है।

दूसरा कारण यह हो सकता है कि वे जानते होंगे कि क़सम का बहुवचन क़समें होता है और उसमें बिंदी लगती है। सो जब रिपोर्टर/कॉपी एडिटर ने मुक़दमा का मुक़दमे किया तो उसमें भी बिंदी लगा दी, आख़िर दोनों के अंत में ‘म’ है। अपनी समझ से उन्होंने अक़्लमंदी का काम किया है लेकिन उनकी इस अक़्लमंदी में किस चीज़ की मंदी है, यह बताने और समझाने वाला कोई सीनियर बंदा या बंदी शायद वहाँ नहीं है। अधिकतर ख़बरिया संस्थानों में यही हाल है।

ख़ैर, हम आज इस क्लास में समझेंगे कि ‘मुक़दमें’ लिखना क्यों ग़लत है। साथ ही इस सवाल का जवाब भी जानेंगे कि यदि क़सम का बहुवचन क़समें लिखना सही है तो मुक़दमा को बहुवचन या एकारांत बनाते समय मुक़दमें लिखना क्यों ग़लत है। और इस बात को कैसे याद रखा जाए ताकि ऐसे ही और मामलों में आगे कभी ग़लती न हो?

आगे बढ़ने से पहले एक बार फिर दोनों शब्दों पर नज़र डालें – मुक़दमा और क़सम। क्या आपने ध्यान दिया कि (1) क़सम, मुक़दमा की तरह आकारांत नहीं है (अकारांत है) और (2) क़सम स्त्रीलिंग है जबकि मुक़दमा पुल्लिंग है। यहीं छुपा है हमारे सवालों का उत्तर। यानी दोनों के बहुवचन रूपों में बिंदी लगाने या न लगाने का जो अंतर है, वह इसीलिए कि क़सम स्त्रीलिंग है (क़सम खाई) जबकि मुक़दमा पुल्लिंग (मुक़दमा लड़ा)।

इस बात को दो नियमों से याद रख सकते हैं। पहला नियम यह कि जब भी कोई पुल्लिंग आकारांत शब्द बहुवचन बनाते समय या ‘के’, ‘से’, ‘में’ आदि कारक चिह्नों से पहले आते समय एकारांत रूप लेता है तो उसमें बिंदी कभी नहीं लगती। हम जानते हैं कि मुक़दमा क्या है — पुल्लिंग (मुक़दमा लड़ा न कि मुक़दमा लड़ी) सो उसके एकारांत रूप में बिंदी कभी नहीं आएगी। और क़सम के बहुवचन रूप में बिंदी इसलिए लगती है कि वह अकारांत है और स्त्रीलिंग है (क़सम खाई न कि क़सम खाया)। सो दूसरा नियम यह बना कि कोई शब्द यदि अकारांत हो और स्त्रीलिंग हो तो उसका बहुवचन बनाने पर उसमें बिंदी लगेगी ही लगेगी।

यदि ऊपर के दोनों नियमों को एक वाक्य में समझना हो तो इस तरह समझें — ‘ए’ से अंत होनेवाले यानी एकारांत शब्दों में बिंदी तभी लगेगी जबकि शब्द स्त्रीलिंग हो; यदि शब्द पुल्लिंग हो तो बिंदी कभी नहीं लगेगी। इसको याद रखने का तरीक़ा भी आसान है हालाँकि कुछ लोग इसे सेक्सिस्ट भी ठहरा सकते हैं — चूँकि भारत में लड़कियाँ और स्त्रियाँ बिंदी लगाती हैं इसलिए स्त्रीलिंग शब्दों में बिंदी लगेगी। पुरुष नहीं लगाते सो पुल्लिंग शब्दों में बिंदी नहीं लगेगी।

चलिए, जब हम नियम समझ गए हैं तो उसी आधार पर ऐसे कुछ और शब्द नीचे देखते हैं।

  • बहन (स्त्री) बहनें
  • शामियाना (पु) शामियाने
  • गहना (पु) गहने
  • बहाना (पु) बहाने
  • शाम (स्त्री) शामें
  • जान (स्त्री) जानें
  • धड़कन (स्त्री) धड़कनें

यह भी जान लीजिए कि यह नियम न, म आदि से ख़त्म होने वाले शब्दों पर ही लागू नहीं होता बल्कि सभी अक्षरों पर लागू होता है – यदि शब्द संज्ञा है, बहुवचन है और एकारांत है तो यही नियम चलेगा – पुल्लिंग में बिंदी नहीं और स्त्रीलिंग में बिंदी। कुछ और उदाहरण देखें।

  • खाता (पु) खाते
  • रात (स्त्री) रातें
  • रास्ता (पु) रास्ते
  • सड़क (स्त्री) सड़कें
  • किताब (स्त्री) किताबें

जब आप यह नियम समझ गए हैं तो इस पर भी ग़ौर कीजिएगा कि यह नियम केवल संज्ञा शब्दों पर लागू है। यदि हम लिखें कि ‘पानी बहने लगा’ तो वहाँ बहने में बिंदी का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि यह ‘बहना’ शब्द से बना है जो क्रिया है। इसी तरह ‘मैं नहाने जा रहा था कि पानी चला गया’ में भी नहाने का लिंग मत चेक करने लगिएगा कि आलिम सर ने बताया था। यह भी क्रिया है।

चलते-चलते एक और बात जान लें। ऊपर हमने संज्ञा शब्दों के एकारांत रूप का नियम जाना। जब इनका ओकारांत रूप होता है तो क्या नियम चलता है? जैसे मुकदमों या मुकदमो, क़समों या क़समो? अच्छी बात यह है कि इसमें कोई भ्रम नहीं है। हर हाल में बिंदी लगेगी। यानी मुकदमों (पु), क़समों (स्त्री), रास्तों (पु), सड़कों (स्त्री), गधों (पु), गायों (स्त्री), सज्जनों (पु), देवियों (स्त्री) सभी में आप बेहिचक बिंदी लगा सकते हैं। यानी ओकारांत शब्दों के मामले में पुल्लिंग में भी बिंदी लगेगी और स्त्रीलिंग में भी। जैसे मंदिर जाने पर स्त्री-पुरुष सभी के माथे पर टीका लगाते हैं, वैसे ही ओकारांत शब्दों के मामले में आप सभी शब्दों में बिंदी लगा सकते हैं।

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2 replies on “क्लास 2 – ‘कसमें’ में बिंदी तो ‘मुक़दमें’ में क्यों नहीं?”

धन्यवाद आलिम सर, भ्रांति दूर करने के लिए।

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