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क्लास 7 – सांड और साँड़ में छुपा है ‘ड’ और ‘ड़’ का नियम

‘ड’ और ‘ड़’ के बारे में एक आसान नियम है कि ड हमेशा शब्द के शुरू में होता है और ‘ड़’ बीच में और आख़िर में। लेकिन कभी-कभी ‘ड’ बीच में और अंत में भी आता है लेकिन कुछ ख़ास स्थितियों में। ऐसा कब होता है, यह जानने के लिए आगे पढ़ें।

क्या आपको ड और ड़ के उच्चारण में अंतर करने में समस्या होती है? कुछ लोगों को होती है लेकिन अगर आप अंग्रेज़ी के पेड (PAID) और हिंदी के पेड़ का अंतर पहचानते हैं तो फिर ज़ाहिर है कि आपको यह समस्या नहीं है। आप बोलेंगे भी सही और लिखेंगे भी सही।

परंतु जो इस मामले में जानकार हैं, उनको भी कुछ शब्दों को लेकर शंकाएँ हो जाती हैं जैसे गडरिया या गड़रिया, साँड या साँड़। इन्हीं शंकाओं को दूर करने के लिए है आज की क्लास जिसमें हम नियमों के आधार पर जानेंगे कि कहाँ हमेशा ड होता है और कहाँ हमेशा ड़। इससे हमें एक-एक शब्द को याद रखने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और नियमों के बल पर हम कह सकेंगे कि यहाँ ड होगा और यहाँ ड़।

शब्द के शुरू में हमेशा ड

किसी शब्द के शुरू में हमेशा ड होगा यानी ड के नीचे नो बिंदी। ऐसा कोई शब्द नहीं है हिंदी में जिसमें शुरू में ड़ हो। इसी कारण यदि अंत्याक्षरी में कोई ‘छड़ी रे छड़ी, कैसी गले में पड़ी’ गा दे तो अगले को ड से ‘डमडम डिगा-डिगा’ या ‘डफली वाले, डफली बजा’ गाने की छूट होती है।

बीच में या अंत में अधिकतर ड़

यदि ऐसा अक्षर शब्द के अंत या बीच में हो तो अधिकतर मामलों में ड़ होगा यानी बिंदी वाला ड। उदाहरण – (अंत में) बड़ा, कड़ा, मोड़, पेड़, साड़ी, आड़ या (बीच में) बोड़म, उड़ान, अड़ियल, (बीच में और अंत में) हड़बड़ी, गड़बड़ी आदि।

आधे अक्षर के सहारे तो ड

ऊपर हमने जाना कि बीच में और अंत में हमेशा ड़ होगा। लेकिन एक स्थिति में बीच में या अंत में ड भी हो सकता है। यह तब उस ड के पहले या बाद में कोई अनुस्वार (बिंदी) या अन्य कोई आधा अक्षर हो। अनुस्वार भी अर्धाक्षर ही होते हैं, यह हम पहले की क्लास में पढ़ चुके हैं। सो जब भी देखें कि किसी ड/ड़ पर या उससे पहले वाले अक्षर पर बिंदी है या उससे पहले या बाद में आधा अक्षर है तो समझें कि वहाँ ड ही होगा, ड़ नहीं। जैसे आडंबर (आडम्बर), डंडा (डण्डा), ठंड (ठण्ड), खंडहर (खण्डहर), उद्दंड (उद्दण्ड), चड्डी आदि।

आपने ऊपर पढ़ा कि अंत में अधिकांशतः ड़ होता है और ड तभी होता है जब उससे पहले कोई व्यंजन हो। इसका एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है साँड़ का जो सांड (साण्ड) भी लिखा जाता है। आप देखिए कि जब ‘सा’ पर बिंदी है यानी ‘सा’ के बाद ण् है तो अंत में ड आता है, लेकिन जब ‘सा’ पर चंद्रबिंदु लगता है यानी उसकी अनुनासिक ध्वनि होती है तो अंत में ड़ हो जाता है।

अंग्रेज़ी और संस्कृत के शब्दों में हमेशा ड

यदि अंग्रेज़ी का शब्द होगा तो चाहे शुरू में हो, बीच में हो या अंत में, हमेशा ड होगा क्योंकि उनकी भाषा में ड़ होता ही नहीं है। इसलिए जो लोग ROAD को रोड़ लिखते हैं, वे ग़लत लिखते हैं (देखें चित्र)।

और उदाहरण हैं – BED=बेड, DOG=डॉग, DOCTOR=डॉक्टर, ADVICE=अडवाइस आदि। वैसे ही यदि संस्कृत का शब्द होगा तो भी हमेशा ड होगा क्योंकि संस्कृत में भी ड़ या ढ़ नहीं होता। जैसे दंड, प्रचंड, बडवाग्नि आदि। उर्दू शब्दों में ड होता ही नहीं है। सो वैसे शब्दों में ड या ड़ का भ्रम है ही नहीं।

उपसर्ग या प्रत्यय हो तो ड

यह तो हम जानते ही हैं कि शब्द के शुरू में हमेशा ड होता है, ड़ कभी नहीं होता। तो ऐसे शब्दों के आगे या पीछे जब उपसर्ग या प्रत्यय लगते हैं तो जो नए शब्द बनते हैं, उनमें ड बीच में आ जाता है लेकिन इन शब्दों को देखकर ही हम समझ सकते हैं कि ये ड से शुरू होनेवाले किसी मूल शब्द से बने हैं। जैसे अडिग, बागडोर, दंडवत। अडिग डिग का, बागडोर डोर का और दंडवत दंड का परिवर्तित रूप है। लेकिन अड़ियल में देखें तो ड़ियल कोई शब्द नहीं होता। इसी तरह गुड़िया में ड़िया कोई शब्द नहीं होता इसलिए यहाँ ड़ है।

आप सोचते होंगे कि आख़िर ऐसा क्यों होता है कि शब्दों के शुरू में हमेशा ड होता है और बीच में और अंत में ड़ (अर्धाक्षरों और उपसर्ग वाले मामलों को छोड़कर)। तो वह इसलिए कि शुरू में ड़ बोलना मुश्किल है और बीच में ड बोलना कठिन। ड बोलने के लिए हमारी जीभ को मुँह की छत को बहुत भीतर तक जाकर छूना होता है (इस स्थान को मूर्धा कहते हैं) जबकि ड़ बोलते समय मुँह की छत को बस छूकर निकल भागना होता है (ड और ड़ बोलकर देखिए)।

तात्पर्य यह कि शब्द के शुरू में तो ड बोलना संभव है मगर यदि यही ड बीच में हो तो कोई अन्य अक्षर बोलने के तुरंत बाद जीभ को ड बोलने के लिए मुँह के अंदरूनी भाग तक जाना अखरता है इसलिए वह शॉर्टकट में ड़ बोलकर ही काम चला लेती है। इसे यूँ समझिए कि आप जब फ्रेश हों तो लंबी ड्राइव पर चलने में आपको नहीं अखरेगा लेकिन थके-हारे हों तो आप जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहेंगे।

ऊपर की बात को गुड्डे और गुड़िया से समझते हैं। आप गुड्डे की तर्ज़ पर गुडिया बोलकर देखें (ड़ि नहीं, डि), आपको मुश्किल होगी लेकिन गुड़िया बोलना आसान लगेगा। इसी को उल्टा करके देखें। गुड्डे की बजाय गुड़्ड़े बोलने की कोशिश करें – जीभ ऐसी टेढ़ी हो जाएगी कि बस… और उच्चारण भी अजब-सा निकलेगा।

ऐसा ही एक और उदाहरण है ठोड़ी और ठुड्डी। दोनों का एक ही मतलब है मगर यदि अंत में ड लगाना है तो एक आधे ड को मदद के लिए लाना होगा – ठुड्डी। वरना आराम से ड़ बोलिए – ठोड़ी।

जो नियम हमने ड और ड़ के बारे में सीखा, वही नियम ढ और ढ़ के बारे में भी लागू है। यानी शुरू में ढ और बीच में व अंत में ढ़। बीच में और अंत में ढ तभी आएगा जब वह संयुक्ताक्षर के रूप में आएगा जैसे बुड्ढा, गड्ढा आदि।

लेक्चर अभी बाक़ी है मेरे भाई

कोई पाठक पूछ सकता है कि क्या अंग्रेज़ों को बीच में ड लगाने पर तकलीफ़ नहीं होती। सवाल जायज़ है। मगर वहाँ भी जीभ अपना कमाल दिखाती है। G और J से पहले जब D आता है तो वह साइलंट हो जाता है यानी जीभ ड तक जाती ही नहीं। जैसे ADJUST=अजस्ट, ADJECTIVE= ऐजिक्टिव, ADJUDGE=अजज, BADGE=बैज। और कभी जब बीच वाले D का उच्चारण होता भी है तो उन मामलों में जहाँ अगला उच्चारण बोलने में जीभ की कोई ख़ास भूमिका नहीं है। जैसे ADVICE=अडवाइस क्योंकि व बोलने में जीभ का कोई विशेष काम नहीं है (बोलकर देखें)। ऐसे ही AD-HOC=ऐडहॉक में भी ह है जिसे बोलने में जीभ की कोई बड़ी भूमिका नहीं है। वैसे इन मामलों में भी जहाँ जीभ को मौका मिलता है, वह ड बोलने से भाग जाती है। जैसे SANDWICH का उच्चारण सैनविच होता है। हाँ, अगर आप अपनी ज़बान को तक़लीफ़ देना चाहें तो सैंडविच भी बोल सकते हैं जैसे अपने देश में कुछ अनजान लोग ADJUST को ऐडजस्ट/एडजस्ट बोलते पाए जाते हैं।

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2 replies on “क्लास 7 – सांड और साँड़ में छुपा है ‘ड’ और ‘ड़’ का नियम”

बहुत ही अच्छे नियम की जानकारी हुई। धन्यवाद ।

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