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‘वंदे मातरम’ का लेखक क्या अंग्रेज़ों का समर्थक था?

‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। पहले इसके शुरुआती दो पद ही राष्ट्रगान में शामिल थे। अब पूरा का पूरा वंदे मातरम इसमें शामिल कर दिया गया है। ये बाक़ी के जो हिस्से हैं, वे न केवल मुस्लिम विरोधी हैं, बल्कि पूरी की पूरी किताब जिसका यह अंश है, मुसलमानों के विरुद्ध और अंग्रेज़ों के समर्थन में है। क्या ऐसे गीत को राष्ट्रगान बनाना उचित है?

हमारे देश के राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ पर वर्षों से विवाद हो रहा है। इस विवाद को जन्म देने वाले तीन तरह के लोग हैं।

  • कुछ लोग कहते हैं कि यह गीत दिसंबर 1911 में ब्रिटिश साम्राज्य के सम्राट जॉर्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया था, जब वे अपनी पत्नी के साथ भारत आए थे। अब हम ब्रिटिश साम्राज्य की ग़ुलामी से निकल चुके हैं, इसलिए एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में इस गीत को दोहराने का कोई अर्थ नहीं है।
  • दूसरे लोग राष्ट्रगान की आलोचना इस आधार पर करते हैं कि इसमें ‘अधिनायक’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है। अधिनायक का अर्थ होता है डिक्टेटर। लेकिन अपने देश में डिक्टेटर नहीं होता, आजादी के बाद हमने डिम़ॉक्रेसी का रास्ता चुना है। फिर हमारा शासक चाहे जो भी हो, उसके अधिनायक होने की महिमा का बखान क्यों किया जाए?
  • तीसरी श्रेणी में वे आलोचक हैं जो कहते हैं कि यह आजादी के पहले का लिखा हुआ गीत है, लेकिन अब सिंध वगैरह तो हमारे पास रहे नहीं। ऐसे में इस गीत का औचित्य नहीं रहता।

जो लोग राष्ट्रगान को ज्यों-का-त्यों रखना चाहते हैं और उसे बदलने की माँग सिरे से ख़ारिज करते हैं, उनका तर्क यह होता है कि राष्ट्रगान का प्रतीकात्मक महत्व है और ऐसे प्रतीक रोज़-रोज़ नहीं बदले जाते। मसलन राष्ट्रध्वज का चक्र अब जीवन के किसी दूसरे क्षेत्र में नजर नहीं आता। शेरों की आबादी लगातार घटती जा रही है, लेकिन हमारे राष्ट्रीय प्रतीक तो वही बने रहेंगे।

आश्चर्य है कि राष्ट्रगान को बदलने की माँग करने वाले ज़्यादातर लोग यह माँग करते हैं कि ‘जन गण मन’ की जगह हमें ‘वंदे मातरम’ को अपना राष्ट्रगान बनाना चाहिए। यह गीत बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंद मठ’ से लिया गया है। लेकिन क्या ‘वंदे मातरम’ विवादों से मुक्त है? नहीं, बल्कि ‘वंदे मातरम’ तो ‘जन-गण-मन’ से ज्यादा विवादित है। अगर पूरा गीत पढ़ें तो पता चलेगा कि इसमें माँ के रूप में दुर्गा की स्तुति है। रवींद्रनाथ टैगोर समेत कई लोगों ने इसको राष्ट्रगान बनाने का इसी आधार पर विरोध किया था कि अनेक धर्मों वाले भारत में ऐसा कोई गीत राष्ट्रगान नहीं बनाया जाना चाहिए, जिसमें किसी एक धर्म के देवी-देवता की स्तुति हो।

इतना ही नहीं , यह गीत जिस उपन्यास से लिया गया है, वह अंग्रेजी शासन का विरोध नहीं, बल्कि समर्थन करता है। आपको शायद विश्वास न हो, लेकिन सच्चाई यही है।

‘आनंद मठ’ की कहानी संन्यासी विद्रोह के ऐतिहासिक प्लॉट के आधार पर लिखी गई थी। किस्सा सन 1769 से शुरू होता है जब बंगाल में मीर जाफ़र के शासन काल में ज़बरदस्त अकाल पड़ा था। मीर जाफ़र के अराजक, अक्षम और क्रूर शासन में जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। ऐसे में उसके शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सत्यानंद नामक संन्यासी एक सशस्त्र संगठन बनाता है, जिसके सदस्य गेरुआ पहनते हैं और कड़े नियमों का पालन करते हुए मातृभूमि को मुसलमान शासन से मुक्त कराने की कोशिश करते हैं। कहानी में मातृभूमि की संतान कहने वाले इन संन्यासियों को अंत में सफलता मिलती है और उत्तर बंगाल में संतानों का प्रभुत्व हो जाता है।

चूंकि मीर जाफ़र को अंग्रेज़ों का समर्थन प्राप्त था, इसलिए संतानों की अगली मुठभेड़ अंग्रेज़ी सेना से हुए। उपन्यास के मुताबिक संतानों ने बहादुरी से लड़ते हुए अंग्रेज़ी फौज को भी हरा दिया। लेकिन कथा के इसी बिंदु पर एक दिव्यपुरुष अवतरित होते हैं और सत्यानंद को युद्ध समाप्त करने का निर्देश देते हैं। उनके मुताबिक संतान विद्रोह का मकसद यही था कि अंग्रेज़ राज्याभिषिक्त हों।

दिव्यपुरुष कहानी के मुख्य पात्र सत्यानंद से कहते हैं, ‘तुम्हारा काम पूरा हुआ। मुसलमान राज्य का ध्वंस हुआ। नाहक हत्या की अब ज़रूरत नहीं। अंग्रेज़ शत्रु नहीं, मित्र हैं। अंग्रेज़ी राज्य में लोग सुखी होंगे – निष्कंटक धर्माचरण करेंगे। इसलिए अंग्रेज़ों से लड़ने की ज़रूरत नहीं है।

वह आगे कहते हैं, ‘अंग्रेज़ अभी बनिया हैं, उनका ध्यान धन कमाने पर है, राज्य शासन का भार नहीं लेना चाहते। इस संतान विद्रोह के कारण वे शासन का भार लेने को मजबूर होंगे क्योंकि बिना राज्य शासन के धन कमाना संभव न होगा। अंग्रेज़ राज्याभिषिक्त हों, इसलिए यह संतान विद्रोह हुआ।‘ वह सत्यानंद को उनकी भूमिका के लिए शाबासी देते हुए कहते हैं, ‘तुम्हारा व्रत पूरा हुआ। तुमने माँ का मंगल किया, अंग्रेज़ों का राज्य ले आए। अब लड़ाई-झगड़ा छोड़ो, लोग खेती-बारी में लगें, धरती अनाज से भरी-पूरी हो, लोग ख़ुशहाल और उन्नत हों।‘

ऊपर के सारे उद्धरण एक पात्र के मुँह से कहलवाए गए हैं, लेकिन वे लेखक की ही टिप्पणियाँ हैं, इसका सबूत पुस्तक में ही अन्यत्र भी दिखता है। बंकिम बाबू ने एक स्थान पर लेखकीय वक्तव्य देते हुए लिखा है,

‘संतानों को यह पता न था कि अंग्रेज़ भारत का उद्धार करने आए हैं। पता भी कैसे होता? समसामयिक अंग्रेज़ भी उस समय यह नहीं जानते थे। उस समय यह बात सिर्फ विधाता के मन में थी।‘

‘आनंद मठ’ में जहाँ अंग्रेज़ों और अंग्रेज़ी शासन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की गई है, वहीं मुसलमानों के प्रति घृणा भी साफ झलकती है। इसी कारण इस उपन्यास को सांप्रदायिक कहा गया। देखने में आता है कि उपन्यास के पात्रों को यदि अंग्रेज़ों से कोई शिकायत है तो सिर्फ यह कि हिंदुओं और मुसलमानों के झगड़े में वे मुसलमान राजा का साथ क्यों दे रहे हैं? इस संवाद पर ग़ोर कीजिए – शांति कहती है कप्तान टॉमस से : ‘…मारपीट हिंदू-मुसलमानों में चल रही है। तुम लोग बीच में कैसे टपक पड़े? लौट जाओ।’

इसी कप्तान टॉमस से एक और संन्यासी भवानंद कहता है, ‘कप्तान साहब, मैं तुम्हारी जान नहीं लूँगा। अंग्रेज़ हमारे दुश्मन नहीं हैं। तुम इन मुसलमानों की मदद में क्यों आए? मैं तुम्हें जान की भीख देता हूँ – तुम बंदी हो। अंग्रेज़ों की जय हो, हम तुम्हारे सुहृद हैं।

बंकिम चंद्र ने भवानंद के मुंह से अंग्रेज़ सैनिकों की तारीफ़ भी कराई है। भवानंद एक स्थान पर अंग्रेज़ और मुस्लिम सैनिक में फर्क करते हुए बताता है, ‘अंग्रेज़ जान जाने पर भी भाग नहीं सकता और मुसलमान को पसीना आया नहीं कि भागा – शरबत खोजता फिरेगा। …तोप का एक गोला देखकर मुसलमानों की पूरी जमात भाग जाएगी, जबकि तोपों की भीड़ देखकर कोई एक अंग्रेज़ भी नहीं भागेगा।

संन्यासियों का मुस्लिम द्वेष उपन्यास में जगह-जगह झलकता है। सत्यानंद एक स्थान पर कहता है, ‘हम राज्य नहीं चाहते। चूँकि मुसलमान धर्म-विद्वेषी हैं, इसलिए उनका विनाश चाहते हैं।’ लड़ाई के दौरान उन्होंने इसे सच भी करके दिखाया। कुछ अंश देखिए – ‘वे गाँवों में जाते। हिंदुओं से कहते, विष्णु पूजा करोगे? और कुछ लोगों को इकट्ठा करके मुसलमानों के घरों को आग लगा देते। वे बेचारे जान बचाने की फ़िक्र में लग जाते, इधर संतानगण उनका सबकुछ लूटकर नए विष्णुभक्तों को बाँट देते। लोग लूट का हिस्सा पाकर ख़ुश होते तो वे उन्हें मंदिर में ले जाते। भगवान का चरण छुआकर संतान बनाते। …कोई कहने लगा, भाई, वह दिन भी आएगा जब मस्जिद तोड़कर राधा-माधव का मंदिर बनाएँगे।

संतान जब जीत गए, तो विजयोन्माद में क्या-क्या करने लगे, इसका हाल लेखक ने इस तरह बयान किया है : ‘उस रात हरिनाम की गूँज से वह भूमि भर गई। … कुछ संतान गांव या शहर की तरफ दौड़े और रास्ते में जो भी राही या गृहस्थ मिलते, उनसे कहने लगे, कहो वंदे मातरम। नहीं कहोगे तो जान से मार डालेंगे। कोई हलवाई की दुकान लूटकर खाने लगे, तो कोई ग्वाले के घर-घुसकर दूध-दही के मटके में मुँह लगाने लगे। कहने लगे, हम सब ब्रजगोप आए हैं, गोपियाँ कहां हैं? गाँव-गाँव, नगर-नगर में कोलाहल मच गया।

बंकिम इस आतंक राज के समर्थक नहीं लगते। वे मीर जाफ़र के शासन के खिलाफ हुए सशस्त्र संग्राम का पक्ष तो लेते हैं, लेकिन कहीं यह नहीं कहते कि मुसलमानों पर हुआ अत्याचार ठीक था। मुसलमानों पर हिंदुओं के ग़ुस्से का कारण भी वह मीर जाफ़र के कुशासन को ही देते हुए लिखते हैं : ‘ मुसलमानों से लोग जी से बिगड़े हुए थे क्योंकि अराजकता थी, शासन ठीक नहीं था। हमले के शिकार मुसलमानों के लिए भी उन्होंने ‘बेचारे’ शब्द का प्रयोग किया है। बल्कि लड़ाई में विजय के बाद दिव्यपुरुष के मुँह से वे यह कहलवाते हैं, ‘सत्यानंद, तुमने दस्युवृत्ति द्वारा धन संग्रह करके लड़ाई जीती है। पाप का फल कभी पवित्र नहीं होता। इसलिए तुम देश का उद्धार नहीं कर सकते।’

अब बंकिम ने ‘आनंद मठ’ में अंग्रेजों का समर्थन क्यों किया, इस पर हम नहीं जाएँगे। वे स्वयं अंग्रेजी शासन में बड़े अधिकारी थे, इसलिए यह स्वाभाविक है। लेकिन अंग्रेज़ी शासन समर्थक इस उपन्यास के इस हिंदू गीत को राष्ट्रगान आखिर कैसे बनाया जा सकता है?

यह लेख 28 जनवरी 2012 को नवभारत टाइम्स के विभिन्न संस्करणों में प्रकाशित हुआ था। यहाँ उसी लेख को हलके-फुलके परिवर्तन के साथ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है।

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