गौतम बुद्ध से जुड़ा एक बहुत ही प्रसिद्ध और लोकप्रिय कथन है – अप्प दीपो भव जिसका मतलब आम तौर पर अपना दीपक ख़ुद बनो – यह समझा जाता है। परंतु कई बौद्ध विद्वानों और अध्येताओं का मानना है कि बुद्ध के इस उद्धरण में जिस दीप शब्द का प्रयोग किया गया है, उसका अर्थ दीपक नहीं, द्वीप यानी टापू है। आइए, पता करते हैं कि इस उद्धरण में दीप का अर्थ क्या है।
अप्प दीपो भव में दीप के अर्थ को लेकर विवाद इसलिए है कि पाली में दीप का अर्थ दीपक भी है और द्वीप भी (देखें चित्र)।

अब ऐसे में कैसे तय किया जाए कि बुद्ध ने जब दीप कहा होगा तो उनका आशय क्या रहा होगा। हमारे पास कोई रिकॉर्डिंग तो है नहीं, बस एक ग्रंथ है जिसमें बुद्ध द्वारा कही गई इस बात को लेखबद्ध किया गया है।
वह ग्रंथ क्या है? उस ग्रंथ का नाम है महापरिनिब्बान सुत्त (महापरिनिर्वाण सूत्र)। इसमें बुद्ध के अंतिम दिनों का विवरण हैं और उन दिनों में बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद से जो कहा था, उसका उल्लेख है।
जब किसी विषय में कोई विवाद हो तो खोजी व्यक्ति को मूल स्रोत तक जाना चाहिए। मैंने भी वही किया और इंटरनेट पर उपलब्ध महापरिनिब्बान सुत्त का वह हिस्सा खोजा तो उसमें मुझे ये पंक्तियाँ मिलीं। वहाँ इसका अनुवाद नहीं दिया गया है, केवल मूल टेक्स्ट है जो इस प्रकार है।
तस्मातिहानन्द, अत्तदीपा विहरथ अत्तसरणा अनञ्ञसरणा, धम्मदीपा धम्मसरणा अनञ्ञसरणा।
मैं पाली नहीं समझता इसलिए इसका विश्वसनीय अनुवाद खोजा। नेट पर मुझे जो अनुवाद मिला, वह इस प्रकार है –
33. “Therefore, Ananda, be islands unto yourselves, refuges unto yourselves, seeking no external refuge; with the Dhamma as your island, the Dhamma as your refuge, seeking no other refuge.
हिंदी अनुवाद : अतः आनंद, अपने द्वीप ख़ुद बनो, अपने आश्रय स्वयं बनो, कोई अन्य आश्रय मत खोजो। धर्म का दीप और धर्म का आश्रय। कोई अन्य आश्रय नहीं।
इस अनुवाद में तो दीप का अर्थ island यानी टापू लिया गया है लेकिन अधिकतर लोग इसका अर्थ दीपक समझते हैं। क्या इसका अर्थ दीपक है या टापू है? इसका फ़ैसला एक पल में हो सकता है अगर आप अत्तदीपा विहरथ पर ध्यान दें। दीप के बाद विहरथ है जो विहरति क्रिया से बना है और जिसका मतलब है रहना। अब अगर इसका मतलब दीपक लिया जाए तो कोई व्यक्ति अपने दीपक में कैसे रह सकता है? हाँ, द्वीप में अवश्य रहा जा सकता है।
इसी बात को आगे भी दोहराया गया है और हर बार अत्तदीपा/अत्तदीपो के बाद विहरति क्रिया के ही अलग-अलग रूप दिए गए हैं।
कथञ्चानन्द, भिक्खु अत्तदीपो विहरति अत्तसरणो अनञ्ञसरणो, धम्मदीपो धम्मसरणो अनञ्ञसरणो?
एवं खो, आनन्द, भिक्खु अत्तदीपो विहरति अत्तसरणो अनञ्ञसरणो, धम्मदीपो धम्मसरणो अनञ्ञसरणो
ये हि केचि, आनन्द, एतरहि वा मम वा अच्चयेन अत्तदीपा विहरिस्सन्ति अत्तसरणा अनञ्ञसरणा, धम्मदीपा धम्मसरणा अनञ्ञसरणा
यहाँ ग़ौर करने वाली बात है कि ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ का जो अंश हमने देखा, उसमें ‘अप्प दीपो भव’ नहीं है, ‘अत्तदीपा विहरथ’ है। लेकिन तर्क के लिए हम मान लेते हैं कि महापरिनिब्बान सुत्त के ही किसी और पाठ में ‘अत्तदीपा विहरथ’ नहीं, ‘अप्प दीपो भव’ लिखा मिलता है। क्या उस पाठ के अनुसार दीप का मतलब दीपक हो सकता है?
आइए, यह भी जाँच लेते हैं।
किसी भी ग्रंथ में कोई ऐसा शब्द हो जिसके एकाधिक अर्थ निकलते हों तो उसका अर्थ पहचानने का एक तरीक़ा यह है कि जहाँ उस शब्द का प्रयोग किया गया है, वहाँ वह किस अर्थ में सटीक बैठता है। ऊपर हमने यही तरीक़ा अपनाया।
परंतु ऐसे किसी शब्द का अर्थ पता लगाने का एक और तरीक़ा है। वह है कि जिस ग्रंथ में उस शब्द का प्रयोग हुआ है, उस ग्रंथ के बाक़ी हिस्से में उस शब्द का कितनी बार और किस अर्थ में प्रयोग हुआ है।
मसलन रामचरितमानस की ‘ढोर, गँवार, सूद्र, पसु नारी’ वाली चौपाई में ‘ताड़ना’ के अर्थ पर विवाद है। कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ ताड़ना का अर्थ ‘समझना’ है परंतु यदि पता करें कि तुलसीदास ने रामचरितमानस में ताड़न शब्द का प्रयोग कितनी बार और किस अर्थ में किया है तो मालूम हो जाएगा कि इस चौपाई में उनका आशय क्या था।
मैंने इसकी जाँच की और पता चला कि पूरे मानस में ‘ताड़न’ या ‘ताड़ना’ का प्रयोग तीन बार हुआ है। एक तो इस चौपाई में और बाक़ी दो जगह और। अन्यत्र दोनों स्थानों में इसका अर्थ पीटना ही है। इस पर मैंने विस्तार से लिखा है। चाहें तो यहाँ क्लिक/टैप करके पढ़ सकते हैं।
तो जो विधि मैंने ‘ताड़ना’ के मामले में अपनाई, वही विधि जब ‘दीप’ के मामले में अपनाते हैं तो पता चलता है कि ‘दीप’ शब्द का प्रयोग इस ग्रंथ में 15 बार हुआ है।
- 8 बार दीप के रूप में और उसी उद्धरण में जिसका ऊपर उल्लेख किया और जिनमें उसका अर्थ द्वीप ही निकलता है क्योंकि उसके बाद विहरति (रहना) क्रिया के रूप हैं।
- 4 बार वेट्ठदीप (एक स्थान का नाम)। यहाँ भी दीप का अर्थ टापू है।
- 1 बार जंबूदीप के रूप में। यहाँ भी दीप का मतलब टापू है।
इसके अलावा 2 बार ‘दीप’ का प्रयोग दीपक के अर्थ में भी हुआ है लेकिन स्वतंत्र शब्द के तौर पर नहीं बल्कि दूसरे शब्द के अंश के तौर पर। जैसे दो बार तेलपदीप शब्द का इस्तेमाल हुआ है। इसके अलावा दीपक के लिए तेलपज्जोत शब्द का भी दो बार प्रयोग हुआ है (देखें चित्र)।

तो निष्कर्ष यह कि भले ही पाली में दीप के दोनों अर्थ हों मगर इस ग्रंथ में दीपक के लिए पदीप और पज्जोत का प्रयोग हुआ है, दीप का नहीं। अगर विवेचित उद्धरण में दीप का अर्थ दीपक होता तो वहाँ भी तेलपदीपं या तेलपज्जोतं का प्रयोग होता, दीप का नहीं।
अब रहा प्रश्न कि जब बात द्वीप की है तो ‘अप्प दीपो भव’ कैसे प्रचलित हो गया। इस ग्रंथ में तो ‘अत्तदीपा विहरथ’ है, ‘अप्प/अत्त दीपो भव’ नहीं है।
मैंने इंटरनेट पर खोजा लेकिन मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली कि यह कथन महापरिनिब्बान सुत्त के ही किसी और पाठ या बुद्ध संबंधी किसी और ग्रंथ में है।
कई बार ऐसी बातें लोकजीवन में प्रचलित हो जाती हैं जो किसी ग्रंथ में नहीं होतीं। जैसे राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे, यह न तो रामचरितमानस में है, न वाल्मीकि रामायण में। (विस्तार से जानकारी नीचे दिए गए लेख में।)
इसी तरह युधिष्ठिर द्वारा कहा गया वक्तव्य – अश्वत्थामा हतः, नरोवा कुंजरो – भी प्रचलित है लेकिन युधिष्ठिर ने ऐसा कोई वचन कहा हो, ऐसा महाभारत में नहीं मिलता। (विस्तार से जानकारी नीचे दिए गए लेख में।)
यही बात ‘अप्प दीपो भव‘ के मामले में भी हो सकती है। लेकिन मैं ऐसा यक़ीनी तौर पर नहीं कह सकता। अगर आपकी जानकारी में ऐसा कोई ग्रंथ या पाठ हो तो कृपया बताएँ ताकि हम सबकी खोज और विस्तृत तथा हम सबका ज्ञान और पूर्ण हो सके।
